Thursday, 23 March 2017

हिंदुत्व की परिभाषा

हिन्दू शब्द का मूल बहुत पुराना नहीं, यह नाम दिया गया था मुगलों द्वारा! सिन्धु के इस पार के सारे क्षेत्र को उन लोगों ने हिन्द कहा, और यहाँ के लोगों को हिन्दू या हिन्दी! फिर अंग्रेज इतिहासकारों ने इसे इस्तेमाल करना शुरू किया और यह शब्द भारत के मूल निवासियों  कि पहचान बन गया!

इस से पहले हिन्दू या हिंदुत्व नाम का कोई आस्तित्व नहीं था! भारत के लोग सब एक ही तरीके से रहते थे और उन्हें स्वयम को भारतवासी के अतिरिक्त किसी और नाम की आवश्यकता नहीं थी! विदेशी आक्रमणकारियों के यहाँ आकर बसने के बाद, और धर्म परिवर्तन का दौर शुरू होने के बाद, ज़रूरत पडी लोगों को उनकी जीवन-शैली के आधार पर बांटने की! 

आज जिन्हें हिन्दू कहते हैं, वे हैं असल में सनातन धर्मी! और धर्म की परिभाषा पूछें तो बहुत सीधे शब्दों में यह एक दूसरा नाम है जीवन-शैली का! वह जीवन शैली जिसमें हर प्राणी को परमात्मा का रूप माना  गया, जिसमें हर स्त्री को आदि-शक्ति का रूप कहा गया, जिसमें, जीवन का आधार परोपकार को बताया गया, जिसमें यज्ञ (दान इत्यादि) के बिना किसी भी वस्तु के भोग को पाप बताया गया, वह जीवन शैली हमारे पूर्वजों ने हमें विरासत में दी! उसका हर पहलू विज्ञान पर आधारित है, हर नियम के पीछे एक सामाजिक उत्थान छिपा है! यही है हिंदुत्व की परिभाषा!

हिंदुत्व का बहुत बड़ा आधार है सहिषुणता और सहजता।  सहिषुणता यानि कि कोई कितना भी हमें तोड़ने का प्रयास करले, हम टूटते नहीं हैं।  हम दुसरे के आघात को अपनी शक्ति बना लेते हैं।  हमारा ह्रदय त्न बड़ा है कि हम दूसरे देश के लोगों को, दूसरी जीवन-शैली के लोगों को भी प्रेम की दृष्टि से देखते हैं और उन्हें अपने ही समान परमात्मा का रूप मानते हैं।  हम उनके धर्म को भी अपने धर्म के समान सम्मान देते हैं।  क्योंकि हमारे ग्रंथों ने हमने यह नहीं सिखाया कि कोई एक रास्ता है परमात्मा तक पहुँचने का, हमें यह सिखाया है कि सभी रास्ते अंततः ईश्वर तक ही जाते हैं।  कोई राजमार्ग से जाये या पगडंडी से, पहुंचना तो सभी को वहीं है।  इसी कारण एक हिन्दू के मस्जिद और चर्च में जा कर भी प्रार्थना करने में कोई आपत्ति नहीं उठाते, उसे मंदिर जाने के समान ही धर्ममय मानते हैं।

भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा है कि ईश्वर एक अनदेखी, अनिर्वचनीय सत्ता है, हम उसे किसी भी नाम से पुकारें कोई अंतर नहीं पड़ता, क्योंकि वह नाम से नहीं भाव से जाना जाता है।  अब चाहे हम अपने ग्रंथों में  करोड़ देवी-देवताओं को पुकारें, या जीसस को या अल्लाह को, यदि हमारा भाव शुद्ध है, हम बिना किसी लाग-लपेट के, एकचित्त हो कर, उसे पुकारते हैं, तो हम उसी ईश्वर को पुकारते हैं।  स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने तो ऐसे कई प्रयोग भी कर के देखे, भिन्न भिन्न  प्रकार से ईश्वर की आराधना करी, और यही निष्कर्ष निकला कि प्रत्येक बार उन्हें उसी परमपिता परमात्मा की शरण मिली। ऐसे में तर्क-बुद्धि से यही परिणाम निकलता है कि जहां कहीं भी कोई भी सच्चे मन से ईश्वर का आराधन करता है, और परमार्थ हेतु सब कर्म करता है, वह सनातन धर्मी ही कहा जा सकता है। हमारे ग्रंथों का तो यही मानना है, और कोई इसे माने या ना माने।

एक हिन्दू के लिए पाप क्या है और पुण्य क्या, इसकी परिभाषा भी बहुत सहज है।  ऐसा कहा गया है कि एक ही कार्य  एक समय में पाप और दुसरे समय में पुण्य का रूप ले सकता है।  जो परमार्थ हेतु (प्राणी-मात्र के, समाज के या देश के उत्थान हेतु) किया गया कार्य है वह पुण्य, और जो अपने स्वार्थ हेतु दूसरे को दुःख देकर किया गया कार्य है वह पाप।  इन दो पंक्तियों में सारे धर्म का सार छिपा है। बाकी जो भी परिभाषा कही गयी हैं, वह सब सांकेतिक है, वह श्रद्धा और भाव सिखाने के तरीके मात्र हैं लेकिन यद् उन्हें केवल तन से अपनाया और मन से नहीं तो उनका कोई अर्थ नहीं।

कोई पूजा से पहले स्नान करके शुद्ध हुआ या नहीं, कोई मंदिर में सिर ढक कर बैठा या नहीं, किसी ने मूर्ती को साष्टांग प्रणाम किया या नहीं, आरती के या स्तुति के पूरे शब्द गाए या नहीं -  ईश्वर को इन सब बाहरी संकेतों से कोई सरोकार नहीं, उन्हें तो केवल शुद्ध भाव ही भाता है।  यदि कोई व्यक्ति इन सब में से कुछ भी नहीं करता लेकिन दरिद्र-नारायण की सेवा करता है, सत्य की साधना करता है, समाज में प्रेम का संचार करता है, तो वह सब से बड़ा पुण्यवान है।  और यह सब करे भी यदि कोई स्वार्थपूर्ण जावन जी रहा है, दीनों का तिरस्कार करता है, समाज में हिंसा फैलता है, और असत्य -वाणी बोलता है, तो उससे बड़ा पापी कोई नहीं।

आज देश में बहुत भाँती के लोग बसते हैं, सब अपने आप को इसका या उसका अनुयायी मानते हैं, और उन सब कारणों से बहुत भेदभाव उत्पन्न होता है।  यदि हम सांकेतिक पाप-पुण्य को छोड़ कर उनके मन के भाव के अनुसार उन्हें सम्मान दें, तो ही हमारे समाज में पुनः शांति हो सकती है।  सभी वर्गों और सभी तथाकथित धर्मों के लोगों को समझना चाहिए कि जो देश का और समाज का हित करेगा वही सच्चा मनुष्य है, और उसे ही सम्मान का अधिकार है, चाहे वह राम की पूजा करे या जीसस की, या अल्लाह की।  राष्ट्रपति कलाम को कोई हिन्दू बुरा नहीं कह सकता, क्योंकि उन्होंने सच्चे मन से देश की सेवा करी, और तथाकथित हिन्दू समुदाय के सदस्य लालू, मुलायम और केजरी, अपने स्वार्थ और देशद्रोह के कारण, बुरे ही कहलायेंगे।  इतने से ही हमें समझ जाना चाहिए कि अच्छे बुरे की पहचान उसके कर्म से होनी चाहिए न कि उसके नाम से।  अन्यथा नफरत का तो कोई अंत नहीं।  

Gitanjali Mittal













































हिंदुत्व आन्दोलन के प्रमुख विचार संपादित करें

हिंदुत्व आन्दोलन के प्रमुख विचार संपादित करें

हिन्दुत्ववादी कहते हैं कि हिन्दू शब्द के साथ जितनी भी भावनाएं और पद्धतियाँ, ऐतिहासिक तथ्य, सामाजिक आचार-विचार तथा वैज्ञानिक व आध्यात्मिक अन्वेषण जुड़े हैं, वे सभी हिन्दुत्व में समाहित हैं। हिन्दुत्व शब्द केवल मात्र हिन्दू जाति के कोरे धार्मिक और आध्यात्मिक इतिहास को ही अभिव्यक्त नहीं करता। हिन्दू जाति के लोग विभिन्न मत मतान्तरों का अनुसरण करते हैं। इन मत मतान्तरों व पंथों को सामूहिक रूप से हिन्दूमत अथवा हिन्दूवाद नाम दिया जा सकता है। आज भ्रान्तिवश हिन्दुत्व व हिन्दूवाद को एक दूसरे के पर्यायवाची शब्दों के रूप में प्रयोग किया जा रहा है। यह चेष्टा हिन्दुत्व शब्द का बहुत ही संकीर्ण प्रयोग है।
हिन्दुत्ववादियों के अनुसार हिन्दुत्व किसी भी धर्म या उपासना पद्धति के ख़िलाफ़ नहीं है।
वो तो भारत में सुदृढ़ राष्ट्रवाद और नवजागरण लाना चाहता है। उसके लिये हिन्दू संस्कृति वापिस लाना ज़रूरी है।
अगर समृद्ध हिन्दू संस्कृति का संरक्षण न किया गया तो विश्व से ये धरोहरें मिट जायेंगी। आज भोगवादी पश्चिमी संस्कृति से हिन्दू संस्कृति को बचाने की ज़रूरत है।
हिन्दुत्व गाय पशु का संरक्षण करता है।
ईसाई और इस्लाम धर्म हिन्दू धर्म को पाप और शैतानी धर्म मानता है। इस्लाम के अनुसार हिन्दू लोग क़ाफ़िर हैं।
मुसलमान हिन्दू बहुल देशों में रहना ही नहीं चाहते। वो एक वृहत्-इस्लामी उम्मा में विश्वास रखते हैं और भारत को दारुल-हर्ब (विधर्मियों का राज्य) मानते हैं। वो भारत को इस्लामी राज्य बनाना चाहते हैं।
मुसलमान हिंसा से और ईसाई लालच देकर हिन्दुओं (ख़ास तौर पर अनपढ़ दलितों को) अपने धर्म में धर्मान्तरित करने में लगे रहते हैं।
इस्लामी बहुमत पाकिस्तान (अखण्ड भारत का हिस्सा) भारत को कभी चैन से जीने नहीं देगा। आज सारी दुनिया को इस्लामी आतंकवाद से ख़तरा है। अगर आतंकवाद को न रोका गया तो पहले कश्मीर और फिर पूरा भारत पाकिस्तान के पास चला जायेगा।
कम्युनिस्ट इस देश के दुश्मन हैं। वो धर्म को अफ़ीम समझते हैं। उनके हिसाब से तो भारत एक राष्ट्र है ही नहीं, बल्कि कई राष्ट्रों की अजीब मिलावट है। रूस और चीन में सभी धर्मों पर भारी ज़ुल्मो-सितम ढहाने वाले अब भारत में इस्लाम के रक्षक होने का ढोंग करने के लिये प्रकट हुए हैं।
अयोध्या का राम मंदिर हिन्दुओं के लिये वैसा ही महत्त्व रखता है जैसे काबा शरीफ़ मुसलमानों के लिए या रोम और येरुशलम के चर्च ईसाइयों के लिये।[कृपया उद्धरण जोड़ें]

हिन्दुत्व

हिन्दुत्व हिन्दू धर्म के अनुयायियों को एक और अकेले राष्ट्र में देखने की अवधारणा है। हिन्दुत्ववादियों के अनुसार हिन्दुत्व कोई उपासना पद्धति नहीं, बल्कि हिन्दू लोगों द्वारा बना एक राष्ट्र है। वीर सावरकर ने हिन्दुत्व और हिन्दूशब्दों की एक परिभाषा दी थी जो हिन्दुत्ववादियों के लिये बहुत महत्त्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि हिन्दू वो व्यक्ति है जो भारत को अपनी पितृभूमि और अपनी पुण्यभूमि दोनो मानता है। हिन्दू धर्म को सनातन, वैदिक या आर्य धर्म भी कहते हैं। हिन्दू एक अप्रभंश शब्द है। हिंदुत्व या हिंदू धर्म को प्राचीनकाल में सनातन धर्म कहा जाता था। एक हजार वर्ष पूर्व हिंदू शब्द का प्रचलन नहीं था। ऋग्वेद में कई बार सप्त सिंधु का उल्लेख मिलता है। सिंधु शब्द का अर्थ नदी या जलराशि होता है इसी आधार पर एक नदी का नाम सिंधु नदी रखा गया, जो लद्दाख और पाक से बहती है।

भाषाविदों का मानना है कि हिंद-आर्य भाषाओं की 'स' ध्वनि ईरानी भाषाओं की 'ह' ध्वनि में बदल जाती है। आज भी भारत के कई इलाकों में 'स' को 'ह' उच्चारित किया जाता है। इसलिए सप्त सिंधु अवेस्तन भाषा (पारसियों की भाषा) में जाकर हप्त हिंदू में परिवर्तित हो गया। इसी कारण ईरानियों ने सिंधु नदी के पूर्व में रहने वालों को हिंदू नाम दिया। किंतु पाकिस्तान के सिंध प्रांत के लोगों को आज भी सिंधू या सिंधी कहा जाता है।

ईरानी अर्थात पारस्य देश के पारसियों की धर्म पुस्तक 'अवेस्ता' में 'हिन्दू' और 'आर्य' शब्द का उल्लेख मिलता है। दूसरी ओर अन्य इतिहासकारों का मानना है कि चीनी यात्री हुएनसांग के समय में हिंदू शब्द की उत्पत्ति ‍इंदु से हुई थी। इंदु शब्द चंद्रमा का पर्यायवाची है। भारतीय ज्योतिषीय गणना का आधार चंद्रमास ही है। अत: चीन के लोग भारतीयों को 'इन्तु' या 'हिंदू' कहने लगे।













हिन्दू धर्म

रक्त में उबाल हो, क्रोध की मशाल हो !
धड़कने भड़क रही, जैसे कि भूचाल हो !!
माँ भारती पुकारती, कहाँ पे मेरे लाल हो !
यदि मेरा ख्याल हो, न द्वंद न सवाल हो !!
रक्त से करो श्रृंगार, आँचल ये मेरा लाल हो !
विजयी तुम्हारा भाल, और शत्रु का कपाल हो !!
असुरजनों का अंत हो, हों तो मात्र संत हो !
धर्म हो सुपंथ हो, सृजन हो न कि अंत हो !!
उठो उठो बढ़ो बढ़ो, बढ़ो बढ़ो बढे चलो !
लगा लो मृत्यु कंठ से, लौह में ढले चलो !!
विजय की भोर हो सदा, ना हार की निशीथ हो !
ह्रदय में एक भाव हो, हिन्दूरक्त में उबाल हो, क्रोध की मशाल हो !
धड़कने भड़क रही, जैसे कि भूचाल हो !!
माँ भारती पुकारती, कहाँ पे मेरे लाल हो !
यदि मेरा ख्याल हो, न द्वंद न सवाल हो !!
रक्त से करो श्रृंगार, आँचल ये मेरा लाल हो !
विजयी तुम्हारा भाल, और शत्रु का कपाल हो !!
असुरजनों का अंत हो, हों तो मात्र संत हो !
धर्म हो सुपंथ हो, सृजन हो न कि अंत हो !!
उठो उठो बढ़ो बढ़ो, बढ़ो बढ़ो बढे चलो !
लगा लो मृत्यु कंठ से, लौह में ढले चलो !!
विजय की भोर हो सदा, ना हार की निशीथ हो !
ह्रदय में एक भाव हो, हिन्दू धर्म की ही जीत हो !! धर्म की ही जीत हो !!

Wednesday, 22 March 2017

पानी से दीपक जलने वाला देवी माँ का मंदिर


धर्म और आस्था में कई ऐसे चमत्कार होते है जिनसे भगवान में ओर भी श्रद्दा बढ़ जाती है | ऐसा ही एक चमत्कार एक देवी के मंदिर में दिखाई देता है जिसमे दीपक को जलाने के लिए किसी घी या तेल की जरुरत नही होती | यह क्रम आज से नही बल्कि पिछले पाँच साल से चल रहा है |


जानिए कहाँ है मंदिर :
यह मंदिर है गड़ियाघाट वाली माताजी का जो नलखेड़ा से 15 किमी दूर गाँव गाड़िया के पास पास कालीसिंध नदी के किनारे है |

दूर दूर से आते है श्रद्धालु :
माँ की महिमा की ऐसी ज्ञाता सुनकर भक्त दूर दूर से माँ के दर्शन करने आते है | आँखों के सामने पानी से दीपक की ज्योत देखकर उनकी भक्ति और श्रद्दा ओर बढ़ जाती है |

क्यों जल रहा है पानी से दीपक :


यहा के पुजारीजी सिद्धूसिंह जी के अनुसार पहले माँ के मंदिर में हमेशा तेल का दीपक जलता था | एक दिन उन्हें सपने में माँ ने दर्शन दिए और कहा की तुम अब से पानी से उनके दीप जलाओ |
माँ के आदेश अनुसार पुजारी ने जब पानी से दीपक जलाया तो वो जल उठा | बस माँ के इस चमत्कारी शक्ति से आज भी दीपक जलाने के लिए पानी का सहारा किया जाता है |
दीपक में पानी पास की नदी में कालीसिंध नदी से लाया जाता है |

सूर्य मंदिर


कहाँ है यह सूर्य मंदिर :
यह सूर्य देवता का मंदिर बिहार के औरंगाबाद के देव में स्थित है | इसकी रूप रेखा  उड़ीसा के जगन्नाथ मंदिर से मिलती जुलती है | यह काले भूरे  पत्थरों के प्रयोग से  अनुपम वास्तुकला से बना हुआ है | इसमे भी सूर्य देवता के रथ की आकृति दिखाई पड़ती है | मंदिर पश्चिम दिशा की तरफ देखता हुआ है | यह अति प्राचीन मंदिर है |

चमत्कारी रूप से मंदिर ने बदली अपनी दिशा :
इस मंदिर को लेकर यह मान्यता है की इसने अपनी दिशा पूर्व से पश्चिम कर ली | इसके पीछे एक कथा प्रचलित है |




एक बार किसी ने इस मंदिर को तोड़ने के लिए कोई दल आगे बढ़ा | मंदिर के पुजारियों ने उस दल से बड़ी विनती करी की वे सूर्य भगवान के इस मंदिर को ना तोड़े | तब उस दल के मुखिया ने मजाक में यह कह दिया की यदि यह मंदिर सच्चा है तो कल तक अपनी दिशा बदल कर दिखा दे | पूरी रात मंदिर के पुजारियों ने विनती की हे प्रभु चमत्कार दिखाओ और मंदिर को बचाओ |

अगली सुबह सब विस्मित हो गये जब उन्होंने देखा की मंदिर का मुख  पूरब से पश्चिम हो गया | सभी पंडित और भक्त सूर्य भगवान की जयजयकार करने लग गये | जब उस दल ने यह चमत्कार अपनी आँखों से देखा तो वे भी इस मंदिर के सामने नतमस्तक हो गये |

हिंदू इतिहास की भूमिका अनिरुद्ध जोशी


हिन्दू धर्म का इतिहास बहुत प्राचीन है। यह परम्परा वेदकाल से पूर्व की मानी जाती है, क्योंकि वैदिककाल और वेदों की रचना का काल अलग-अलग माना जाता है। सदियों से वाचिक परंपरा चली आ रही है फिर इसे लिपिबद्ध करने का काल भी बहुत लंबा रहा है।

जब हम इतिहास की बात करते हैं तो वेदों की रचना किसी एक काल में नहीं हुई। विद्वानों ने वेदों के रचनाकाल की शुरुआत 4500 ई.पू. से मानी है। अर्थात यह धीरे-धीरे रचे गए और अंतत: माना यह जाता है कि पहले वेद को तीन भागों में संकलित किया गया- ऋग्‍वेद, यजुर्वेद व सामवेद जि‍से वेदत्रयी कहा जाता था। मान्यता अनुसार वेद का वि‍भाजन राम के जन्‍म के पूर्व पुरुरवा ऋषि के समय में हुआ था। बाद में अथर्ववेद का संकलन ऋषि‍ अथर्वा द्वारा कि‍या गया।
दूसरी ओर कुछ लोगों का यह मानना है कि कृष्ण के समय में वेद व्यास ने वेदों का विभाग कर उन्हें लिपिबद्ध किया था। इस मान से लिखित रूप में आज से 6508 वर्ष पूर्व पुराने हैं वेद। यह भी तथ्‍य नहीं नकारा जा सकता कि कृष्ण के आज से 5300 वर्ष पूर्व होने के तथ्‍य ढूँढ लिए गए हैं।

हिंदू और जैन धर्म की उत्पत्ति पूर्व आर्यों की अवधारणा में है जो 4500 ई.पू. मध्य एशिया से हिमालय तक फैले थे। आर्यों की ही एक शाखा ने पारसी धर्म की स्थापना भी की। इसके बाद क्रमश: यहूदी धर्म दो हजार ई.पू., बौद्ध धर्म पाँच सौ ई.पू., ईसाई धर्म सिर्फ दो हजार वर्ष पूर्व, इस्लाम धर्म आज से 14 सौ वर्ष पूर्व हुआ।

लेकिन धार्मिक साहित्य अनुसार हिंदू धर्म की कुछ और धारणाएँ हैं। मान्यता यह भी है कि 90 हजार वर्ष पूर्व इसकी शुरुआत हुई थी। रामायण, महाभारत और पुराणों में सूर्य और चंद्रवंशी राजाओं की वंश परम्परा का उल्लेख मिलता है। इसके अलावा भी अनेक वंश की उत्पति और परम्परा का वर्णन है। उक्त सभी को इतिहास सम्मत क्रमबद्ध लिखना बहुत ही कठिन कार्य है, क्योंकि पुराणों में उक्त इतिहास को अलग-अलग तरह से व्यक्त किया गया है जिसके कारण इसके सूत्रों में बिखराव और भ्रम निर्मित जान पड़ता है किंतु जानकारों के लिए यह भ्रम नहीं है।

दरअसल हिंदुओं ने अपने इतिहास को गाकर, रटकर और सूत्रों के आधार पर मुखाग्र जिंदा बनाए रखा। यही कारण रहा कि वह इतिहास धीरे-धीरे काव्यमय और श्रृंगारिक होता गया जिसे आज का आधुनिक मन इतिहास मानने को तैयार नहीं है। वह दौर ऐसा था जबकि कागज और कलम नहीं होते थे। इतिहास लिखा जाता था शिलाओं पर, पत्थरों पर और मन पर।

जब हम हिंदू धर्म के इतिहास ग्रंथ पढ़ते हैं तो ऋषि-मुनियों की परम्परा के पूर्व मनुओं की परम्परा का उल्लेख मिलता है जिन्हें जैन धर्म में कुलकर कहा गया है। ऐसे क्रमश: 14 मनु माने गए हैं जिन्होंने समाज को सभ्य और तकनीकी सम्पन्न बनाने के लिए अथक प्रयास किए। धरती के प्रथम मानव का नाम स्वायंभव मनु था और प्रथम ‍स्त्री थी शतरूपा। महाभारत में आठ मनुओं का उल्लेख है। इस वक्त धरती पर आठवें मनु वैवस्वत की ही संतानें हैं। आठवें मनु वैवस्वत के काल में ही भगवान विष्णु का मत्स्य अवतार हुआ था।

पुराणों में हिंदू इतिहास की शुरुआत सृष्टि उत्पत्ति से ही मानी जाती है। ऐसा कहना कि यहाँ से शुरुआत हुई यह ‍शायद उचित न होगा फिर भी हिंदू इतिहास ग्रंथ महाभारत और पुराणों में मनु (प्रथम मानव) से भगवान कृष्ण की पीढ़ी तक का उल्लेख मिलता है।

हिंदू धर्म के इस चैनल में हम आपको बताएँगे कि आखिर में हिंदू धर्म का क्रमश: इतिहास क्या है। क्या है वैदिक प्रतीकों और पौराणिक कथाओं का सच। क्या है सृष्टि उत्पत्ति और प्रलय की धारणा के अलावा अब तक हुए राजाओं और धर्म पुरुषों की गाथा। इति।

हिन्‍दुत्‍व अथवा हिन्‍दू धर्म



हिन्दुत्व को प्राचीन काल में सनातन धर्म कहा जाता था। हिन्दुओं के धर्म के मूल तत्त्व सत्य, अहिंसा, दया, क्षमा, दान आदि हैं जिनका शाश्वत महत्त्व है। अन्य प्रमुख धर्मों के उदय के पूर्व इन सिद्धान्तों को प्रतिपादित कर दिया गया था। इस प्रकार हिन्दुत्व सनातन धर्म के रूप में सभी धर्मों का मूलाधार है क्योंकि सभी धर्म-सिद्धान्तों के सार्वभौम आध्यात्मिक सत्य के विभिन्न पहलुओं का इसमें पहले से ही समावेश कर लिया गया था। मान्य ज्ञान जिसे विज्ञान कहा जाता है प्रत्येक वस्तु या विचार का गहन मूल्यांकन कर रहा है और इस प्रक्रिया में अनेक विश्वास, मत, आस्था और सिद्धान्त धराशायी हो रहे हैं। वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आघातों से हिन्दुत्व को भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि इसके मौलिक सिद्धान्तों का तार्किक आधार तथा शाश्वत प्रभाव है।

आर्य समाज जैसे कुछ संगठनों ने हिन्दुत्व को आर्य धर्म कहा है और वे चाहते हैं कि हिन्दुओं को आर्य कहा जाय। वस्तुत: 'आर्य' शब्द किसी प्रजाति का द्योतक नहीं है। इसका अर्थ केवल श्रेष्ठ है और बौद्ध धर्म के चार आर्य सत्य की व्याख्या करते समय भी यही अर्थ ग्रहण किया गया है। इस प्रकार आर्य धर्म का अर्थ उदात्त अथवा श्रेष्ठ समाज का धर्म ही होता है। प्राचीन भारत को आर्यावर्त भी कहा जाता था जिसका तात्पर्य श्रेष्ठ जनों के निवास की भूमि था। वस्तुत: प्राचीन संस्कृत और पालि ग्रन्थों में हिन्दू नाम कहीं भी नहीं मिलता। यह माना जाता है कि परस्य (ईरान) देश के निवासी 'सिन्धु' नदी को 'हिन्दु' कहते थे क्योंकि वे 'स' का उच्चारण 'ह' करते थे। धीरे-धीरे वे सिन्धु पार के निवासियों को हिन्दू कहने लगे। भारत से बाहर 'हिन्दू' शब्द का उल्लेख 'अवेस्ता' में मिलता है। विनोबा जी के अनुसार हिन्दू का मुख्य लक्षण उसकी अहिंसा-प्रियता है

हिंसया दूयते चित्तं तेन हिन्दुरितीरित:।

एक अन्य श्लोक में कहा गया है

ॐकार मूलमंत्राढ्य: पुनर्जन्म दृढ़ाशय:

गोभक्तो भारतगुरु: हिन्दुर्हिंसनदूषक:।

ॐकार जिसका मूलमंत्र है, पुनर्जन्म में जिसकी दृढ़ आस्था है, भारत ने जिसका प्रवर्तन किया है, तथा हिंसा की जो निन्दा करता है, वह हिन्दू है।

चीनी यात्री हुएनसाग् के समय में हिन्दू शब्द प्रचलित था। यह माना जा सकता है कि हिन्दू' शब्द इन्दु' जो चन्द्रमा का पर्यायवाची है से बना है। चीन में भी इन्दु' को इन्तु' कहा जाता है। भारतीय ज्योतिष में चन्द्रमा को बहुत महत्त्व देते हैं। राशि का निर्धारण चन्द्रमा के आधार पर ही होता है। चन्द्रमास के आधार पर तिथियों और पर्वों की गणना होती है। अत: चीन के लोग भारतीयों को 'इन्तु' या 'हिन्दु' कहने लगे। मुस्लिम आक्रमण के पूर्व ही 'हिन्दू' शब्द के प्रचलित होने से यह स्पष्ट है कि यह नाम मुसलमानों की देन नहीं है।

भारत भूमि में अनेक ऋषि, सन्त और द्रष्टा उत्पन्न हुए हैं। उनके द्वारा प्रकट किये गये विचार जीवन के सभी पहलुओं पर प्रकाश डालते हैं। कभी उनके विचार एक दूसरे के पूरक होते हैं और कभी परस्पर विरोधी। हिन्दुत्व एक उद्विकासी व्यवस्था है जिसमें अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता रही है। इसे समझने के लिए हम किसी एक ऋषि या द्रष्टा अथवा किसी एक पुस्तक पर निर्भर नहीं रह सकते। यहाँ विचारों, दृष्टिकोणों और मार्गों में विविधता है किन्तु नदियों की गति की तरह इनमें निरन्तरता है तथा समुद्र में मिलने की उत्कण्ठा की तरह आनन्द और मोक्ष का परम लक्ष्य है।

हिन्दुत्व एक जीवन पद्धति अथवा जीवन दर्शन है जो धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को परम लक्ष्य मानकर व्यक्ति या समाज को नैतिक, भौतिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक उन्नति के अवसर प्रदान करता है। हिन्दू समाज किसी एक भगवान की पूजा नहीं करता, किसी एक मत का अनुयायी नहीं हैं, किसी एक व्यक्ति द्वारा प्रतिपादित या किसी एक पुस्तक में संकलित विचारों या मान्यताओं से बँधा हुआ नहीं है। वह किसी एक दार्शनिक विचारधारा को नहीं मानता, किसी एक प्रकार की मजहबी पूजा पद्धति या रीति-रिवाज को नहीं मानता। वह किसी मजहब या सम्प्रदाय की परम्पराओं की संतुष्टि नहीं करता है। आज हम जिस संस्कृति को हिन्दू संस्कृति के रूप में जानते हैं और जिसे भारतीय या भारतीय मूल के लोग सनातन धर्म या शाश्वत नियम कहते हैं वह उस मजहब से बड़ा सिद्धान्त है जिसे पश्चिम के लोग समझते हैं । कोई किसी भगवान में विश्वास करे या किसी ईश्वर में विश्वास नहीं करे फिर भी वह हिन्दू है। यह एक जीवन पद्धति है; यह मस्तिष्क की एक दशा है। हिन्दुत्व एक दर्शन है जो मनुष्य की भौतिक आवश्यकताओं के अतिरिक्त उसकी मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक आवश्यकता की भी पूर्ति करता है।