Tuesday, 18 February 2020

Key

   KEY   
मानव जीवन में परिश्रम बहुत आवश्यक है। परिश्रम ही सफलता की कुंजी है। परिश्रम द्वारा छोटे से छोटा मनुष्य बड़ा बन सकता है। परिश्रम के द्वारा सभी कार्य सम्भव हैं। यदि मनुष्य कोई भी काम कठोर परिश्रम एवं दृढ़ संकल्प लेकर करता है तो वह उस काम में सफलता अवश्य पाता है।जीवन के प्राचीन युग से लेकर आधुनिक युग तक ग्राम-नगरों का विकास, अनेक उपकरणों एवं मशीनों का शिल्प लेकर वायुयान तक का निर्माण परिश्रम द्वारा ही सम्भव हुआ है। संसार में मानव अधिक परिश्रम कर अपनी तकदीर बदल सकता है।विभिन्न अर्थशास्त्रिष्यों एवं इतिहासकारों द्वारा परिश्रम को ही जीवन का सार माना गया है। संसार की किसी भी वस्तु का निर्माण परिश्रम बिना सम्भव नहीं है। परिश्रमी व्यक्ति को दूसरों पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं होती, वह अपना कार्य स्वंय कर लेते हैं।आज मानव ने परिश्रम के द्वारा संसार में स्वर्ग उतारने की कल्पना को साकार कर दिया हैं | कठोर परिश्रम करके ही मानव ने अनेक आविष्कार किये हैं जो मानव जीवन में बहुत उपयोगी हैं। मनुष्य के मनोरंजन ने दूरदर्शन, सिनेमा, मोबाइल, कम्प्यूटर एवं अनेक प्रकार के मनोरंजन के साधनों का आविष्कार किया है। ये सब केवल परिश्रम द्वारा ही सम्भव हो सकता है। यदि मानव परिश्रम नहीं करेगा तो वह सरल से सरल काम को भी कठिनाई से पूर्ण करेगा। परिश्रमी मनुष्य कभी भी भूखा नहीं रह सकता। परिश्रमी व्यक्ति के लिए सफलता उसकी दासी के रूप में होती है।
K. KNOW = जानना
ज्ञान और अज्ञान में इतना ही भेद है कि बीच में एक भ्रम का परदा लगा हुआ है। जहां परदा खुल गया, अज्ञान समाप्त हो गया, ज्ञान की ज्योति जग गई, मनुष्य जो अपने आपको भूला हुआ था, होश में आ गया कि मैं कौन हूं? मेरा लक्ष्य क्या है? मैं क्या करने आया था और क्या करने लगा? मैं क्या लेकर आया था और मुझे क्या लेकर जाना है? इस प्रकार अज्ञान रूपी अंधकार में फंसा हुआ जीव प्रकाश होते ही सत्य को देखने लगता है। यह बात अत्यंत विचारणीय है कि- हे मनुष्य, तू हंस स्वरूप हैं। जब तक तू कर्तापन के भ्रम में फंसा हुआ है कि तू नर है या नारी, बूढ़ा है या जवान है, पूजा-पाठ, क्रिया-कर्म, गीता-भागवत, रामायण, वेद शास्त्र, उपन्यास जितना मर्जी पढ़ लो लेकिन ज्ञान के बिना सब अधूरा है क्योंकि ज्ञान में ही सब लय है। अगर ज्ञान नहीं है तो सब कुछ अधूरा-सा ही लगेगा। इसलिए हे मनुष्य! तू चेतन है, पहले अपने होश में तू आ जा। 'कहां से तू आया कहां लपटायो?' ' निर्गुण से हंस आयो, सर्गुण में समायो, काया गढ़ की बंधी माया में समाया।' सर्गुण माने यह स्वर जो चल रहा है। निर्गुण से आकर यह स्वर में प्रवेश किया। बहुत से लोग सर्गुण इस शरीर को मानते हैं या वह जो मूर्ति प्रतिमा दिखाई देते हैं उन्हें सर्गुण मानते हैं, पर वह सर्गुण नहीं है। जो यह स्वर चल रहा है और इसका गुणों में प्रवेश है, उसे सर्गुण कहते हैं। सर्गुण में समायो और कायागढ़ की बंधी माया में आकर डेरा डाला, मकान जो बना था उसमें डेरा डाला और जो काया से माया तक का विस्तार हुआ था इसमें तू लपटा गया तो सब कुछ भूल गया, होश नहीं रहा, फिर कोई संत मिले और चेतावनी दी कि- हे मनुष्य! तू कहां भरमा था, देख तू कौन है? पांच तत्व में तू कोई तत्व ही नहीं, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश में तू कुछ भी नहीं। तू न रजो गुण है, न सतो गुण और न तमो गुण है। फिर तू क्या है? 'चेतन जीव आधार है, सोहंग आप ही आप।'
E. EASY = आसान
जी हां, मुश्किल काम या हालात को आसान और अनुकूल बनाना तभी संभव है जब व्यवहार, विचार और स्वभाव में कुछ जरूरी बदलाव लाए जाएं। इंसान स्वभाविक रूप से सुख, सुविधा और अच्छा व्यवहार चाहता है और बुरे समय या बातों से बचना पसंद करता है। किंतु अनेक बार दूसरों के लिए इन बातों के विपरीत व्यवहार कर गुजरता है। दरअसल, साधारण व्यक्ति के  लिए धर्म पर बात करना तो सरल है, लेकिन धर्म को जीवन में उतारना या व्यवहार में अपनाना उतना ही मुश्किल। धर्मशास्त्रों में बताए कुछ अहम सूत्र हर व्यक्ति को धर्म से जोड़कर व्यावहारिक जीवन को भी सुखी और शांत बनाते हैं। जानते हैं क्या कहते हैं ये सूत्र? लिखा गया है कि - व्यावहारिक मतलब यही है कि जो व्यक्ति अपनी खुशियों और कामयाबी के साथ दूसरों से भी प्रेम, सहयोग और सम्मान चाहता है तो पहले वह स्वयं अपने बोल, व्यवहार व सोच में सुधार लाए। वह कटु बोल, दूसरों के अपमान या उपेक्षा, ईष्र्या जैसे बुरे भावों को छोड़ दे। इन बदलावों से दूसरों का भरपूर प्रेम, सम्मान, मदद और भरोसा मिलेगा। 
                            Y. YOUR DECISION = आपका र्निणय
आपका निर्णय कितना अच्छा है? निर्णय लेना कार्यस्थल में एक महत्वपूर्ण कौशल है, और विशेष रूप से महत्वपूर्ण है यदि आप एक प्रभावी नेता बनना चाहते हैं। चाहे आप यह तय कर रहे हों कि किस व्यक्ति को किराए पर लिया जाए, किस सप्लायर को इस्तेमाल किया जाए, या कौन सी रणनीति अपनाई जाए, उपलब्ध जानकारी के साथ एक अच्छा निर्णय लेने की क्षमता महत्वपूर्ण है। यह आसान होगा यदि आप किसी भी स्थिति में एक सूत्र का उपयोग कर सकते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। प्रत्येक निर्णय अपनी चुनौतियों को प्रस्तुत करता है, और हम सभी के पास समस्याओं को हल करने के विभिन्न तरीके हैं। तो, आप बुरे निर्णय लेने से कैसे बचें - या मौका देने के लिए फैसले छोड़ दें? निर्णय लेने के लिए आपको एक व्यवस्थित दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है, ताकि आपको किस प्रकार का निर्णय लेना पड़े, आप इसे विश्वास के साथ ले सकते हैं  कोई भी गरीब निर्णय लेने का जोखिम नहीं उठा सकता है। इसलिए हमने आपके वर्तमान निर्णय लेने के कौशल का आकलन करने में आपकी मदद के लिए एक संक्षिप्त प्रश्नोत्तरी विकसित की है। हम इस बात की जाँच करेंगे कि आप अपनी निर्णय लेने की प्रक्रिया को कितनी अच्छी तरह से तैयार करते हैं, और फिर हम आपको उन विशिष्ट उपकरणों और संसाधनों की ओर संकेत करेंगे जिनका उपयोग आप इस महत्वपूर्ण योग्यता को विकसित करने और सुधारने के लिए कर सकते हैं 

Thursday, 14 February 2019

sarjikal strike 2

हमें दुबारा sarjikal strike चाहिए वरना शत्ता भूल जाओ।
हमारे देश के वरिष्ट नेता गण से पूरा देश जवानों की र्निशन्स हत्या का बदला हमारा पूरा देश माॅग रहा है। पूरा देश आपके साथ खड़ा होगा जब आप आतन्कवादियों को सजा देंगें।
इसको इतना फैला दो की हर नेता के पास पहुॅचे और उन्हे मालूम हो की देश की जनता क्या चाहती है।
जय हिन्द, वन्दे मातरम्।

Thursday, 7 February 2019

BEGIN- शुरूआत

BEGIN- शुरूआत

B- BELIVE YOUR SELF - आत्मविश्वास
E- EAGER TO LEARN    - सिखने की चाहत
G- GOAL                         - लक्ष्य
I- IN FRONT OF            -  सामने आना 
N- NEGATIVE JACE     -  ना को हाॅ में बदलना

BEGIN- शुरूआत

जब हम किसी भी कार्य की शुरूआत करते हैं तो हमें बहुत सी कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। अगर हम अपने कार्य के शुरूआत में ही हार जाते हैं तो हम असफल हो जाते हैं। वहीं उसी कार्य को जो व्यक्ति पूरे आत्मविश्वास और दृढ़ता के साथ करता है तो उसका सफलता प्राप्त करना भी सुनिश्चित हो जाता है।
B- BELIVE YOUR SELF - आत्मविश्वास
आत्मविश्वास इसांन के अन्दर एक ऐसी शक्ति होती है जो की अगर सकारात्मक हो तो वह इन्सान को बुलन्दियों तक पहुॅचा देता है। वहीं अगर नकारात्मक हो तो असफलता की तरफ ढ़केल देता है। आत्मविश्वास इन्सान के आत्मज्ञान और दृड़ संकल्प से ही सकारात्मक होता है।
E- EAGER TO LEARN - सिखने की चाहत
किसी भी व्यक्ति की तरक्की तभी तक होती रहती है जब तक वह अपने अन्दर सिखने की चाहत रखता है। जिस समय भी आप के अन्दर सिखने की चाहत खत्म हो जाती है उसी समय आपकी तरक्की रूक जाती हैजैसा की कहा जाता है की मनुष्य मरते दम तक सिखता है तो अपने अन्दर सिखने की चाहत कभी खत्म नहीं करनी चाहिए।
G- GOAL - लक्ष्य 
हम कहीं भी कोई भी कार्य करते हैं तो सबसे पहले हमें एक लक्ष्य बनाना चाहिए क्योंकी बिना किसी लक्ष्य के हमारी मेहनत व्यर्थ हो जाती है। जैसा की एक आदमी पानी के लिए कुऑ खोदना शुरू करता है परन्तु कोई लक्ष्य ना होने के कारण वह थोड़ा - 2 कई जगह खोदता है जिस कारण वह थक जाता है परन्तु पानी नहीं मिलता है। वहीं अगर वह लक्ष्य बना कर एक ही जगह पर खोदाई करता तो उसे पानी अवश्य मिलता।
I- IN FRONT OF -  सामने आना 
जब हमारा व्यक्तित्व हमारे आस पास रहने वाले लोगों से अलग होता है तो हम उनसे अलग दिखते हैं जब हम अपनी मानसिकता भेड़ों की तरह बनाते हैं तो हम क्षुण्ड में रहना पसन्द करते हैं और भीड़ में खो जाते हैं। लेकिन अगर शेर की मानसिकता रखते हैं तो हम भीड़ से अलग भीड़ के सामने होते हैं। तब हमारा व्यक्तित्व ही अलग दिखता है और हम अपने कार्य क्षेत्र में सफल हो जाते हैं।
N- NEGATIVE JACE -  ना को हाॅ में बदलना 
जब कोई भी कार्य करते हैं तो उसके नकारात्मक पहलु बताने वाले बहुत लोग मिलते हैं अगर हम उनकी बातों में आ जाते हैं तो हमारे अन्दर नकारात्मक सोच आ जाती है और हम अपने जिवन में असफल हो जाते हैं। वहीं अगर हम उनकी नकारात्मक सोच को नाकारा करके अपने अन्दर सकारात्मक सोच को लाते हैं तो हम अपने जिवन में सफल हो जाते हैं।

Wednesday, 6 February 2019

AMBITION - महत्वाकाक्षां

AMBITION - महत्वाकाक्षां

A  -  AIM                        -   लक्ष्य
M -  MIND PEACE        -   शान्त दिमाग
B  -  BIG THINKING     -   बडी सोच
I   -  INTELLIGENT      -   समक्षदारी
T  -  TRUST                    -   भरोसा
I  -  IDEA                       -   जानकारी 
O- OBEY-   आज्ञाकारी
N- NEVER HOPELESS -  कभी निराश ना होना

AMBITION- महत्वाकाक्षां

यदि हमें बड़ी सफलता प्राप्त करनी है तो हमें अपनी ईच्छा (Desires) को भी बड़ा बनाना होगा। जिसकी जितनी बड़ी इच्छा हगी, उसे उतनी ही बड़ी सफलता प्राप्त होगी। जब हम अपनी किसी इच्छा को इतना बड़ा कर लेते हैं जिसे पूरा करने के लिए हमें बहुत मेहनत करनी होती है, तो उस बहुत बड़ी इच्छा को ही महत्वाकाक्षां कहते है। 

A- AIM - लक्ष्य
इस दुनिया का प्रत्येक व्यक्ति केवल एक ही उद्देश्य और अधिकार के साथ पैदा होता है और वह है सफलता प्राप्त करना। जी हां हम सभी इस जगत में प्राप्त करने ही आये हैं। सफलता प्राप्त करना हमारा उद्देश्य है। सफलता प्राप्त करना हमारा अधिकार है और सफलता प्राप्त करना हमारा कर्तव्य भी है। हमारा मंजिल वही है जिसे प्राप्त करने में हमें आनन्द का अनुभव हो। अत:  आप अपनी मंजील को किसी दूसरे के बताने सफलता नहीं बल्की खुद चुनिए।
M- MIND PEACE- शान्त दिमाग
आप किसी से मिलते हैं, वे ऊॅची आवाज में बात करते हैं और तनावग्रस्त हैं, तो आप शायद उसी के अनुसार प्रतिक्रिया और व्यवहार करेगें तो आपका तनाव बढेगा। लेकिन यदि आप शान्त रहें, बात करें, कार्य करें और शान्ति से प्रतिक्रिया दें तो लोग अनजाने में आपके व्यवहार का अनुकरण करते हैं।
B- BIG THINKING- बड़ी सोच
किसी भी महान उपलब्धिकर्ताओं ने कभी भी एक बड़े कदम से अपधी यात्रा शुरू नहीं की है, लेकिन उन सभी ने कुछ छोटे से शुरू किया और यात्रा में वे अपनी महानता को जीते हैं।जब आपकी सोच बड़ी होगी तो ही आप ऊॅचाई पर पहुचेगें। आपकी सोच ही आपको कार्य में सफल बनाती है, क्योंकी आप अपनी सोच के अनुसार ही अपने कार्य को पूरा करने की मेहनत करते हैं।
I- INTELLIGENT- समक्षदारी 
आप जब किसी भी काम को करते हैं तो आपकी समक्षदारी ही आपकी उन्नती को आप तक पहुंचाती है। अगर आप किसी काम को आप नादानी से करते हैं तो आप हर क्षेत्र में नाकाम हो जाते हैं। समक्षदार व्यक्ति जिसे मैं एक वैज्ञानिक प्रकार कह सकता हूॅ, और बुध्दिमान लोगों के एक या कई अन्य समुहों को याद किया जा सकता है, जो शायद कलात्मक या अधिक रचनात्मक प्रकार है। "क्या यह सच है" ये अधिक रचनात्मक/कलात्मक व्यक्तियों के प्रकार ये ही साक्षा करते हैं।
T- TRUST- भरोसा 
कोई फर्क नहीं पड़ता की आप अपने जीवन के किस पहलू के बारे में सोच रहे हैं, विश्वास हमेशा एक प्रमुख कारक है। वह परिवार इकाई में हो सकता है, पड़ोस, खेल के मैदान पर या कार्य स्थल में। निश्चित रूप से यह आपके जीवन के बारे में निर्णय लेने के लिए आपके दिन के लिए हमेशा प्रचलित है। यदी आप अपने पर और अपने निर्णयों में विश्वास रखने में असफल रहते हैं तो दूसरों के लिए आपके प्रती सम्मान रखना मुश्किल होता है।
I- IDEA- विचार 
विचारों के आमतौर पर किसी की मानसिक प्रतिनिधित्वामक छवियों के रूप में लिया जा सकता है। विचार भी अमूर्त अवधारणाएं हो सकते हैं, जो मानसिक छवियों के रूप में मौजूद नहीं हैं। कई दार्शनिकों ने विचारों को होमे की एक मौलिक "On to logical" श्रेणी माना है। विचारों के अर्थ को बनाने और समक्षने की क्षमता को मानव की अनिवार्य और परिभाषित विशेषता माना गया है।
O- OBEY- आज्ञाकारी 
हमें हमेशा आज्ञाकारी बनकर रहना चाहिए ताकी हमारे कार्य स्थल से जो भी आदेश मिले तो हम उसे सरलता से पालन कर सकें। जब हम आज्ञाकरी होते हैं तो हमारे व्यवहार को देखकर हमारी प्रगती को हमारे अधिकारी सुनिश्चित कर सकें।
N- NEVER HOPELESS- कभी निराश ना होना 
जब कभी हम किसी काम को करते हैं और वह पूरा नहीं हो पाता या हम असफल हो जाते हैं, तो हमें निराश नहीं होना चाहिए क्योंकी हम जहाॅ असफल होते हैं वहीं से हमारी सफलता के रास्ते की शुरुआत होती है।

Friday, 24 March 2017

माफी से नहीं भरेंगे सदियों के जख्म सतीश पेडणेकर


पोप फ्रांसिस ने पिछले दिनों बोलिविया में अपने प्रवास के दौरान उपनिवेशकाल में लातिनी अमरीका में हुए अत्याचारों में रोमन कैथोलिक चर्च की भूमिका के लिए माफी मांगी। उन्होंने कहा, 'कुछ लोगों की यह बात सही है कि पोप जब उपनिवेशवाद की बात करते हैं तो चर्च की करतूतों को नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन मैं बहुत खेदपूर्वक आपसे कह रहा हूं कि ईश्वर के नाम पर अमरीका के स्थानीय लोगों के खिलाफ कई गंभीर पाप किए गए। मैं विनम्रतापूर्वक माफी मांगता हूं, केवल चर्च द्वारा किए गए अपराधों के लिए ही नहीं वरन् अमरीका की कथित विजय के दौरान स्थानीय लोगों के खिलाफ किए गए अपराधों के लिए भी।' बेशक पोप की माफी देर-सबेर ही सही, अपने अपराधों का एहसास करने की दिशा में एक अच्छा कदम है। लेकिन लातिनी अमरीका के लोगों को यह माफी सुनकर कुछ ऐसा ही लगा होगा जैसा गालिब ने अपने शेर में फरमाया है-
 की मेरे कत्ल के बाद जफा से तौबा
हाय! उस जूद-पशेमां को पशीमां होना
आज जिस ईसाइयत को प्रेम और सेवा की प्रतिमूर्ति के रूप में दुनिया के सामने पेश किया जाता है उस ईसाइयत की असलियत कुछ और ही है। इतिहास गवाह है कि ईसाइयत उस साम्राज्यवाद की भुजा थी जिसने दुनियाभर में जिस तरह नरसंहार, दूसरे मतों और संस्कृतियों पर हमले किए उसकी दूसरी कोई मिसाल इतिहास में नहीं मिलती। हम भारतीयों के बीच अक्सर इस्लाम के जुल्म और अत्याचारों की चर्चा होती है, लेकिन ईसाइयत का इतिहास और भी ज्यादा काला, भीषण और विकराल है। मुसलमानों का साम्राज्यवाद केवल तीन उपमहाद्वीपों एशिया, यूरोप और अफ्रीका  में रहा मगर ईसाइयों का साम्राज्यवाद पांच महाद्वीपों में रहा। इसलिए उनके केवल लातिनी अमरीका से माफी मांगने से काम नहीं चलने वाला, उन्हें पांचों महाद्वीपों से अलग-अलग माफी मांगनी होगी। तभी उनके घावों पर मरहम लग सकता है।
ईसाइयत के इतिहास पर सरसरी नजर डालें तो यह देखना दिलचस्प होगा कि यहूदियों के साथ ईसाइयों ने कैसा बर्ताव किया, क्योंकि  ईसा यहूदी थे। ईसा ने कभी कहा था कि मुक्ति यहूदियों को ही मिलेगी, मेरा उपदेश यहूदियों के लिए ही है। मगर जब यहूदियों ने उन्हें मसीहा नहीं माना तो वही सबसे बड़े दुश्मन बन गए। उनका तिरस्कार और उत्पीड़न शुरू हुआ। ईसा को मसीहा मानने वाले ईसाइयों ने यहूदियों से प्रचंड घृणा पाल ली और उनका नरसंहार किया। ईसा ने यहूदियों का मुक्तिदूत होने का दावा किया। पर वे मृत्युदूत और यातनादूत बनकर रह गए। सारे यूरोप में ईसाइयत के फैलने के साथ यहूदी विरोध भी फैला। ज्यादातर इतिहासकारों का मानना है कि ईसाइयत के शुरुआती दिनों से ही उसमें यहूदी विरोधी भावना थी जो आने वाली शताब्दियों में और बलवती हो गई। ईसाइयों द्वारा की गई यहूदियों के खिलाफ हिंसा और हत्याओं ने आखिरकार नरसंहार का रूप लिया। हिटलर ने तो लाखों यहूदियों का नरसंहार किया। 'जीसस क्राइस्ट: एन आर्टीफाइस फॉर एग्रेशन' के लेखक सीताराम गोयल यहूदियों के नरसंहार को  सीधे ईसा से प्रेरित बताते हैं। वे लिखते हैं-'गोस्पल के ईसा ने यहूदियों की सांप, सांपों का बिल, शैतान की औलाद, मसीहाओं के हत्यारे कहकर निंदा की क्योंकि उन्होंने ईसा को मसीहा मानने से इंकार कर दिया था। बाद की ईसाई पांथिक किताबों ने  उनको ईसा के हत्यारे के तौर पर स्थायी अपराध भाव से भर दिया। यहूदियों को सारे यूरोप में सदियों तक गैर नागरिक बना दिया गया। उनको लगातार हत्याकांड का शिकार बनाया गया। लेकिन हिटलर के उदय से पहले कोई गोस्पल के संदेश को इतने सुव्यवस्थित तरीके से लागू नहीं कर पाया। न फाइनल सोल्यूशन का ब्लू प्रिंट बना पाया। संक्षेप में हिटलर के अलावा कोई भी गोस्पल के जीसस द्वारा यहूदियों के बारे में दिए गए फैसले को समझ नहीं पाया। आश्चर्य नहीं कि पश्चिमी देशों के गंभीर चिंतक गोस्पल को पहला यहूदी विरोधी मेनीफैस्टो मानते हैं।'

फ्रांसीसी लेखक और दार्शनिक वाल्टेयर ने ईसाइयत के इतिहास और चरित्र का अध्ययन करने के बाद टिप्पणी की थी-'ईसाइयत दुनिया पर थोपा गया सबसे हास्यास्पद, सबसे ज्यादा एब्सर्ड और रक्तरंजित मत है। हर सम्माननीय व्यक्ति, हर संवेदनशील व्यक्ति को  ईसाई पंथ से डरना चाहिए।' उनकी यह बात सोलह आने खरी है। ईसाइयत का सारा इतिहास रक्तरंजित दास्तान रहा है। सबसे पहला देश, जहां ईसाई पंथ राज-पंथ बना वह था रोम। ईसाइयों का स्वभाव रहा है, जैसे ही पर्याप्त शक्ति संग्रहीत होती है वे भयंकर यातनाओं में और तेजी ले आते हैं। उन्होंने बहुदेववादियों का उत्पीड़न शुरू किया। उन यहूदियों का उत्पीड़न किया जिनसे ईसाइयत उपजी। इसके अलावा उन्होंने अपने संप्रदाय से अलग संप्रदाय के ईसाइयों का भी नृशंस दमन किया। रोम में उन्होंने बहुदेववादियों के सारे उपासना स्थल नष्ट कर दिए। बाद में ईसाइयत यूनान भी पहुंची। किसी जमाने में यूनान पश्चिमी सभ्यता का सिरमौर हुआ करता था, लेकिन ईसाइयों का वर्चस्व बढ़ने के साथ उसका यह सम्मान जाता रहा। स्वामी विवेकानंद ने कहा था-'प्राचीन यूनान ईसाइयों से बहुत पहले पश्चिमी सभ्यता का पहला शिक्षक था। मगर जबसे वह ईसाइ बना उसकी सारी मनीषा और संस्कृति नष्ट हो गई।' कुछ ऐसी ही बात महर्षि अरविंद ने भी कही थी-'यूनानियों के पास ईसाइयों से  ज्यादा प्रकाश था। ईसाई तो प्रकाश के बजाय अंधेरा लाए।'
आक्रामक पंथों के साथ हमेशा ऐसा ही होता है। भारत में जिस प्रकार मंदिरों में अनेक देव मूर्तियां साथ-साथ होती हैं। उसी तरह ग्रीक देवी-देवताओं की मूर्तियां भी वहां के मंदिरों में साथ-साथ होती थीं। उसी तरह पैगन मंदिरों में और वेदियों में विविध देवमूर्तियां साथ-साथ होती थीं। न तो देवताओं में ईर्ष्या और नफरत भरी प्रतिस्पर्धा थी, न पुजारियों के बीच। लेकिन  नए पंथ की सोच में ही कुछ गड़बड़ी थी। इसलिए यूरोप में ईसाइयत का इतिहास विध्वंस गाथाओं से भरा रहा। ईसाइयत ने किस तरह यूरोप पर कब्जा किया, अनेक समाजों और संस्कृतियों के मठ-मंदिरों को नष्ट किया, विचार स्वातंत्र्य को खत्म किया इसका इतिहास रक्तरंजित और रोंगटे खडे़ कर देने वाला है। ईसाई संतों ने इसमें सबसे दुष्टतापूर्ण भूमिका निभाई। ऐसे क्रूर लोगों को वहां 'संत' कहा गया। संत मारियस ने गाउल में अनेक प्रतिमाएं जलाईं। एमिन्स के संत फरमिनस ने जहां भी मूर्तियां पाईं उन्हें नष्ट किया। संत कोलंबस और संत गाल ने सारे यूरोप महाद्वीप में हजारों मंदिरों, मठों और वहां स्थापित मूर्तियों को नष्ट किया, मंदिरों से जुड़े बगीचों को उजाड़ डाला। जर्मनी में तो उन्होंने भीषण तबाही मचाई। संत ऑगस्टीन ने इंग्लैंड में यही किया।
बहुदेवपूजकों के परशियाऔर बाल्टिक क्षेत्रों को तेरहवीं सदी में जबरन ईसाई बनाया गया। पचास साल तक चले भीषण रक्तपात और युद्ध के बाद परशिया ने समर्पण कर दिया। समर्पण की शर्त थी कि सभी नागरिक एक माह के भीतर बप्तिस्मा कराकर ईसाई बन जाएं। जो ऐसा करने से इंकार करें उनका सामाजिक बहिष्कार किया जाए। जो पुरानी पैगन पद्धति जारी रखने का आग्रह करें उन्हें गुलाम बना लिया जाए।
ईसाइयों में शुरू से ही प्रवृत्ति रही है कि एक संप्रदाय दूसरे संप्रदाय वाले की जान ले लेता है। दरअसल  एक संप्रदाय का ईसाई दूसरे संप्रदाय में जाना पाप ही मानता था। उसे राज्य के विरुद्ध अपराध भी घोषित कर दिया जाता था। एक संप्रदाय के राजा कानून बनाकर भिन्न ईसाई संप्रदायों पर पाबंदी तक लगाते थे। राजा थिओडोसियस के समय तक ऐसे 100 कानून थे। तब भी उसने नए कानून बनाए। उनकी संहिता में लिखा था-हमारा आदेश है कि हमारे प्रशासन के अधीन सभी लोग केवल उस ईसाई संप्रदाय के प्रति आस्था रखेंगे जो दिव्य पीटर ने रोम वालों को सौंपा है।...जो अभिशप्त हैं, बीमार हैं केवल वे ही अलग ईसाई संप्रदाय के प्रति निष्ठा जारी रखेंगे। उन्हें पहले दैवीय अभिशाप नष्ट करेगा, साथ ही शासन भी उनका दमन करेगा। असल में यूरोप में पहले पैगन वंश के लोगों का समूल नाश किया गया। फिर अन्य ईसाई संप्रदायों के ईसाइयों को ढूंढकर जलाया गया। लाखों अन्य संप्रदायों के ईसाई सार्वजनिक उत्सवों के दौरान जलाए गए। उन्मत्त ईसाइयों ने समाजों, संस्कृतियों और कौमों का उत्पीड़न किया। इस तरह ईसाइयत ने यूरोप को अपने अधीन किया। पोप ग्रेगरी ने इंग्लैंड के बिशप ऑगस्टीन को सलाह दी कि जो भव्य मंदिर हों उनको नष्ट न  कर उन पर कब्जा करें, वहां की मूर्तियां हटा दी जाएं और वहां 'सच्चे ईश्वर' की पूजा की जाए।
फिर यूरोप के ईसाइयों  ने बाकी महाद्वीपों में जाकर यही इतिहास दोहराया। उन्होंने अमरीका और आस्ट्रेलिया जाकर वहां के स्थानीय निवासियों को असभ्य करार देकर उनका नरसंहार किया और उनकी जमीन आदि पर कब्जा कर लिया। बेनेडिक्ट चर्च के पादरी कोलंबस के पीछे अमरीका पहुंचे। उन्होंने केवल हैती में ही पौने दो लाख मूर्तियों को नष्ट कर दिया, जिनकी वहां के स्थानीय लोग पूजा करते थे। मैक्सिको के पहले पादरी जुआन द जुमरगा ने 1531 में दावा किया था कि उसने 500 से ज्यादा मंदिर नष्ट किए और 20000 से ज्यादा  मूर्तियां तोड़कर मिट्टी में मिला दीं। एक मिशनरी ने बहुत गर्व से लिखा-'उस रात खाना चार फीट ऊंची लकड़ी की मूर्ति को जलाऊ लकड़ी की तरह प्रयोग कर तैयार किया गया था और वहां स्थानीय लोग खड़े देखते रहे।'गांधीवादी चिंतक और इतिहासकार धर्मपाल के शब्दों में कहा जाए तो-'उनकी नजर में विजित को आखिरकार खत्म होना था। भौतिक रूप से न सही मगर संस्कृति और सभ्यता के रूप में आस्टे्रलिया और न्यूजीलैंड के स्थानीय निवासी जल्दी ही नेस्तोनाबूद हो गए थे। उत्तरी अमरीका में उनके पूर्ण उन्मूलन में 300-400 साल लगे। 1492 में अमरीका के स्थानीय लोगों की आबादी 11़ 2 करोड़ से 14 करोड़ के बीच थी।' अफ्रीकी महाद्वीप इस्लाम और ईसाइयत जैसे विस्तारवादी और घोर असहिष्णु मतों के हमलों को झेल रहा है जिन्होंने उसे सदियों से दबोच रखा है। इससे उनकी प्राचीन संस्कृति लगभग खत्म होती जा रही है। दोनों के बीच स्थानीय लोगों को मतांतरित करने की होड़ चल रही है। हाल ही में यह हमला और तेज हुआ है और अफ्रीकी अपने युगों पुराने मतों को खोने की कगार पर हैं। प्राच्य विद्या विशारद कोनरॉड एल्स्ट के मुताबिक अफ्रीका में 1900 में 50 प्रतिशत लोग पैगन मतों को मानते थे। अब ईसाई और मुस्लिम मिशनरियों ने उनकी संख्या को 10 प्रतिशत से कम पर पहुंचा दिया है।
   यह एक नए तरह का उत्पीड़न था। विचारों और संप्रदाय के आधार पर उत्पीड़न। 'हिस्ट्री ऑफ यूरोपियन मोरल्स' के लेखक डब्लू. ई. एच. लेकी ने इस भेद का वर्णन इस तरह किया है-'यह नया उत्पीड़न अधिक लंबे समय तक टिकने वाला व्यवस्थित, अविचलित और अडिग था। लोगों को भीषण यंत्रणा देकर भी थमता नहीं था, न पीछे हटता था। इसे उत्पीड़कों ने अपना अधिकार तो माना ही, अपना कर्तव्य भी माना। ईसाई मत की पांथिक पुस्तकों में ऐसे उत्पीड़न की भरपूर वकालत की गई है।'
ईसाइयत के प्रसार ने न केवल संस्कृतियों का विनाश किया वरन् यूरोप, अमरीका, एशिया, अफ्रीका और आस्ट्रेलिया के लाखों लोगों की हत्या हुई। फ्रांसीसी दार्शनिक वॉल्टेयर                                                                                                                                                                                                                                                                    के शब्दों में कहें तो, ईसाइयत ने काल्पनिक सत्य  के लिए धरती को रक्त से नहला दिया।    अठारहवीं सदी की कई प्रतिभाएं ईसाइयत के इस इतिहास से परिचित थीं। लेकिन बाद में इस बारे में चेतना घटती गई, जबकि कई अध्ययनों से इस बारे में हमारी जानकारी में इजाफा हुआ है। पश्चिमी देश सेकुलर होने के बावजूद अपने को ईसाई मानते हैं। इसलिए सार्वजनिक जीवन और शिक्षा व्यवस्था के जरिये सदियों तक ईसा के नाम पर मानवता के खिलाफ हुए अपराधों को छिपाते रहे। भारत में तो इस काले अध्याय को पूरी तरह से पोंछ दिया गया है, उस पर कभी चर्चा नहीं की जाती। ईसाइयत को प्रेम और सेवा के मत के रूप में प्रचारित किया जाता है। लेकिन उसमें इस बात की चर्चा नहीं की जाती कि इसके लिए कितने लोगों की बलि चढ़ाई गई। जैसा स्वामी विवेकानंद ने कहा था-'तमाम डींगों के बावजूद आपकी ईसाइयत तलवार के बिना कहां सफल हुई? मुझे दुनिया का एक ऐसा देश बताइए। मैं कह रहा हूं, पूरी ईसाइयत के इतिहास में एक मिसाल बताइये, मैं दो नहीं चाहता। मुझे पता है आपके पूर्वज कैसे कन्वर्ट हुए। उनके सामने दो ही विकल्प थे, मत बदलें या मारे जाएं। ये डींगंे मारकर आप मुसलमानों से बेहतर क्या कर सकते हैं? आप शायद यह कहना चाहते हैं कि हम अपनी तरह के अकेले हैं क्योंकि हम दूसरों को मार डालते हैं?'
भारत भी ईसाइयों की विनाशलीला का शिकार हुआ है। पुर्तगालियों की हिंसा जगजाहिर थी तो अंग्रेजों की हिंसा सूक्ष्म थी, चुपचाप जड़ें खोदने वाली थी। एक ईसाई इतिहासकार ने बताया है कि पुर्तगालियों ने अपने कब्जे के भारत में क्या किया। टी.आर. डिसूजा के मुताबिक, 1540 के बाद गोवा में सभी हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियों को तोड़ दिया गया था या गायब कर दिया गया था। सभी मंदिर ध्वस्त कर दिए गए थे और उनकी जमीन और निर्माण सामग्रियों को नए चर्च या चैपल बनाने के लिए इस्तेमाल किया गया था। कई शासकीय और चर्च के आदेशों में हिन्दू पुरोहितों के पुर्तगाली क्षेत्र में आने पर रोक लगा दी गई थी। विवाह सहित सभी हिन्दू कर्मकांडों पर पाबंदी थी। हिन्दुओं के अनाथ बच्चों को पालने का दायित्व राज्य ने अपने ऊपर ले लिया था ताकि उनकी परवरिश एक ईसाई की तरह की जा सके। कई तरह के रोजगारों में हिन्दुओं पर पाबंदी लगा दी गई थी। जबकि ईसाइयों को नौैकरियों मे प्राथमिकता दी जाती थी। राज्य द्वारा यह सुनिश्चित किया गया था कि जो ईसाई बने हैं उन्हें कोई परेशान न करे। दूसरी तरफ हिन्दुओं को चर्च में उनके धर्म की आलोचना करने वाले वक्तव्य सुनने के लिए आना पड़ता था। ईसाई मिशनरियां गोवा में सामूहिक कन्वर्जन करती थीं। इसके लिए सेंट पाल के कन्वर्जन भोज का आयोजन किया जाता था। उसमें ज्यादा से ज्यादा लोगों को लाने के लिए जेसुइट हिन्दू बस्तियों में अपने नीग्रो गुलामों के साथ जाते थे। इन नीग्रो लोगों का इस्तेमाल हिन्दुओं को पकड़ने के लिए किया जाता था। ये नीग्रो भागते हिन्दुओं को पकड़कर उनके मुंह पर गाय का मांस छुआ देते थे। इससे वे हिन्दू लोगों के बीच अछूत बन जाते थे। तब उनके पास ईसाई मत में कन्वर्ट होने के अलावा कोई विकल्प नहीं रह जाता था। इतिहासकार ईश्वर शरण ने अपनी एक पुस्तक में लिखा है-'संत जेवियर के सामने औरंगजेब का मंदिर विध्वंस और रक्तपात कुछ भी नहीं था। अंग्रेज शासन के बारे में नोबल पुरस्कार विजेता वी.एस. नायपाल की यह टिप्पणी ही काफी है-'इस देश में इस्लामी शासन उतना ही विनाशकारी था जितना उसके बाद आया ईसाई शासन। ईसाइयों ने एक सबसे समृद्ध देश में बड़े पैमाने पर गरीबी पैदा की। मुस्लिमों ने दुनिया की सबसे सृजनात्मक संस्कृति को एक आतंकित सभ्यता बना दिया।'

पोप ने अब माफी मांगनी शुरू की है तो केवल लातिनी अमरीका से माफी मांगने भर से काम नहीं चलेगा। उन्हें कई देशों, समाजों, कई मतों और स्वयं ईसाइयत के विभिन्न संप्रदायों से माफी मांगनी पड़ेगी। उन्हें यहूदियों, बहुदेववादियों, अन्य संप्रदाय के ईसाइयों और हिन्दुओं से माफी मांगनी होगी। उन्हें माफी मांगनी पड़ेगी उन लाखों महिलाओं से जिन्हें यूरोप में चुडै़ल कहकर जला दिया गया। उन्हें माफी मांगनी होगी उन लाखों ईसाइयों से जिन्हें मत से विरत होने के कारण यातनाघरों में यातनाएं दी गईं। गैलीलियो जैसे वैज्ञानिकों से प्रताडि़त किए जाने के लिए माफी मांगनी होगी। पोप माफी मांग भी लेंगे, लेकिन क्या ये प्रताडि़त लोग उनकी माफी कबूल करेंगे?
आखिर माफी मांगने से इतिहास तो नहीं बदलता। समय के चक्र को पीछे नहीं चलाया जा सकता। फिर माफी मांगना नाटक और ईसाइयत की छवि सुधारने की कोशिश के अलावा और क्या है? असली माफी तो तब होगी जब ईसाइयत अपना असहिष्णु और विस्तारवादी चरित्र बदले। शायद यह कर पाना पोप के वश की बात नहीं। पोप फ्रांसिस भले कितने ही प्रगतिशील होने का दावा क्यों न करें, ईसाइयत के मूल चरित्र को वे कैसे बदल पाएंगे? कहते हैं, रस्सी जल जाती है पर ऐंठन नहीं जाती।  इस्लाम और ईसाइयत दोनों ही असहिष्णुता रूपी सिक्के के दो पहलू हैं। उनकी असहिष्णुता को देखकर कई बार लगता है महात्मा गांधी द्वारा बार-बार प्रचारित की जाने वाली यह बात सबसे खतरनाक थी कि सभी मत समान हैं या एक है। कैनबरा में जन्मे हिन्दू स्वामी अक्षरानंद के शब्दों में कहा जाए तो, 'यह बहुत मूर्खतापूर्ण और खतरनाक बात प्रचारित की जा रही है कि सभी मत समान या एक ही हैं। हम हिन्दू, ईसा और अल्लाह दोनों की शक्तियों से प्रताडि़त हैं। हिन्दू और अन्य मतों को समान और एक नहीं मान सकते।'



Thursday, 23 March 2017

बिंदास बोल : दिल्ली में एक और कैराना? दिल्ली का घड़ौली बन रहा है कैराना?

http://www.sudarshannews.com/category/bindas-bol/--384




[http://www.sudarshannews.com/category/bindas-bol/--384] [बिंदास बोल : दिल्ली में एक और कैराना? दिल्ली का घड़ौली बन रहा है कैराना?] is good,have a look at it!

हम है मुसलमान

मुंबई के मलाड मुस्लिम बहुल इलाके में 1हिन्दू वृद्ध विधवा महिला सखु किरनसिंह बरसो से अकेले रहती थी। शुक्रवार को उसका निधन अपने घर में हो गया। आस पडोस में मुस्लिम समाज के लोग ही बड़ी संख्या में रहते हैं। उसके परिवार में कोई नहीं था। जब इलाके के मुस्लिम नोजवानो को पता चला तो, पूरे मोहल्ले के लोगो ने हिंदू परंपरानुसार अंतिम संस्कार में लगने वाली सारी सामग्री का इन्तजाम किया। इलाके के मुस्लिम नोजवानो ने उन्हें कंधा देकर सांप्रदायिक सौहाद्र की मिसाल कायम की। लोगो ने नम आँखों से ओशिवारा शमशान घाट में उसका अंतिम संस्कार किया।

ऐसा है मेरा भारत

इस्लामी आतंकवाद

अपने को 'मुसलमान' कहने वाले चरमपंथियों द्वारा किये गये आतंक को इस्लामी आतंकवाद कहते हैं। ये तथाकथित मुसलमान भांति-भांति के राजनीतिक तथा/या मजहबी उद्देश्यों की पूर्ति के लिये आतंक फैलाते हैं।

इस्लामी आतंकवाद मध्य पूर्व, अफ्रीका, यूरोप, दक्षिणपूर्व एशिया, भारत एवं अमेरिका में बहुत दिनों से मौजूद है। आतंकी संगठनों में ओसामा बिन लादेन द्वारा स्थापित अल कायदा नामक सैनिक संगठन कुख्यात है।

इन्हें भी देखें संपादित करें


२००१ से २०१४ के बीच इस्लामी आतंकवाद से प्रभावित क्षेत्र
जेहाद
क्रूसेड
अल कायदा
ओसामा बिन लादेन
तालिबान
आईएसआईएस
हिजबुल्लाह
जैश-ए-मोहम्म्द

मुसलमानो से दस सवाल इनको सुनते ही हर मुसलमान तुरन्त भाग जाता है

यह एक कटु सत्य है कि आज भारतीय महाद्वीप में जितने भी मुसलमान हैं, उनके पूर्वज कभी हिन्दू थे, जिनको मुस्लिम बादशाहों ने जबरन मुसलमान बना दिया था। लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि विदेशी पैसों के बल पर इस्लाम के एजेंट ऐसे हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन कराने में लगे रहते हैं, जो इस्लाम की असलियत से अनभिज्ञ हैं, या जिनको हिन्दू धर्म का आधा अधूरा ज्ञान होता है, और दुर्भाग्य से ऐसे हिन्दू युवक, युवतियां सेकुलर विचार वाले होते हैं, तो इस्लाम के प्रचारक आसानी से उनको इस्लाम जाल में फसा लेते हैं, इसलिए इस्लाम के चक्कर में फसने से बचने का एक ही उपाय है, कि इस्लाम के एजेंटों से तर्कपूर्ण सवाल किये जाएँ। क्योंकि इस्लाम सिर्फ ईमान लाने पर ही जोर देता है, और अगर कोई इस्लाम के दलालों से सवाल करता है, तो यातो वह भड़क जाते हैं, या लड़ने पर उतारू हो जाते हैं।

अक्सर देखा गया है कि कुछ उत्साही हिन्दू इस्लाम के समर्थकों के साथ शाश्त्रार्थ किया करते हैं, इसलिए उनकी सहायता के लिए दस ऐसे सवाल दिए जा रहे हैं, जिनका सटीक, प्रमाण सहित और तर्कपूर्ण जवाब कोई मुल्ला मौलवी नहीं दे सकता।

1. मुसलमानों का दावा है कि कुरान अल्लाह की किताब है, लेकिन कुरान में बच्चों की खतना करने का हुक्म नहीं है, फिर भी मुसलमान खतना क्यों कराते है? क्या अल्लाह में इतनी भी शक्ति नहीं है कि मुसलमानों के खतना वाले बच्चे ही पैदा कर सके? और कुरान के विरद्ध काम करने से मुसलमानों को काफ़िर क्यों नहीं माना जाए?

2. मुसलमान मानते हैं कि अल्लाह ने फ़रिश्ते के हाथो कुरआन की पहली सूरा लिखित रूप में मुहम्मद को दी थी, लेकिन अनपढ़ होने से वह उसे नहीं पढ़ सके, इसके अलावा मुसलमान यह भी दावा करते हैं कि विश्व में कुरान एकमात्र ऐसी किताब है जो पूर्णतयः सुरक्षित है, तो मुसलमान कुरान की वह सूरा पेश क्यों नहीं कर देते जो अल्लाह ने लिख कर भेजी थी, इस से तुरंत पता हो जायेगा कि वह कागज कहाँ बना था? और अल्लाह की राईटिंग कैसी थी? वर्ना हम क्यों नहीं माने कि जैसे अल्लाह फर्जी है वैसे ही कुरान भी फर्जी है।

3. इस्लाम के मुताबिक यदि 3 दिन/माह का बच्चा मर जाये तो उसको कयामत के दिन क्या मिलेगा – जन्नत या जहन्नुम ? और किस आधार पर??

4. मरने के बाद जन्नत में पुरुष को 72 हूरी (अप्सराए) मिलेगी…तो स्त्री को क्या मिलेगा…… 72 हूरा (पुरुष वेश्या) ??और अगर कोई बच्चा पैदा होते ही मर जाये तो क्या उसे भी हूरें मिलेंगी? और वह हूरों का क्या करेगा?

5. यदि मुसलमानों की तरह ईसाई, यहूदी और हिन्दू मिलकर मुसलमानों के विरुद्ध जिहाद करें, तो क्या मुसलमान इसे धार्मिक कार्य मानेंगे या अपराध? और क्यों?

6. यदि कोई गैर मुस्लिम (काफ़िर) यदि अच्छे गुणों वाला हो तो भी, क्या अल्लाह उसको जहन्नुम की आग में झोक देगा….? और क्यों ? और, अगर ऐसा करेगा तो…. क्या ये अन्याय नहीं हुआ??

7. कुरान के अनुसार मुहम्मद सशरीर जन्नत गए थे, और वहां अल्लाह से बात भी की थी, लेकिन जब अल्लाह निराकार है, और उसकी कोई इमेज (छवि) नहीं है तो मुहम्मद ने अल्लाह को कैसे देखा?? और कैसे पहिचाना कि यह अल्लाह है, या शैतान है?

8. मुसलमानों का दावा है कि जन्नत जाते समय मुहम्मद ने येरूसलम की बैतूल मुक़द्दस नामकी मस्जिद में नमाज पढ़ी थी, लेकिन वह मुहम्मद के जन्म से पहले ही रोमन लोगों ने नष्ट कर दी थी। मुहम्मद के समय उसका नामो निशान नहीं था, तो मुहम्मद ने उसमे नमाज कैसे पढ़ी थी? हम मुहम्मद को झूठा क्यों नहीं कहें?

9. अल्लाह ने अनपढ़ मुहम्मद में ऐसी कौनसी विशेषता देखी जो उनको अपना रसूल नियुक्त कर दिया, क्या उस समय पूरे अरब में एकभी ऐसा पढ़ा लिखा व्यक्ति नहीं था, जिसे अल्लाह रसूल बना देता, और जब अल्लाह सचमुच सर्वशक्तिमान है, तो अल्लाह मुहम्मद को 63 साल में भी अरबी लिखने या पढने की बुद्धि क्यों नहीं दे पाया।

10. जो व्यक्ति अपने जिहादियों की गैंग बना कर जगह जगह लूट करवाता हो, और लूट के माल से बाकायदा अपने लिए पाँचवाँ हिस्सा (20 %) रख लेता हो, उसे उसे अल्लाह का रसूल कहने की जगह लुटरों का सरदार क्यों न कहें ?

इस्लाम से बेखबर गाँधी

विजय कुमार सिंघल 'अंजान' in खट्ठा-मीठा | देश-दुनिया
 
गाँधी न केवल इस्लाम के इतिहास को नहीं जानते थे, बल्कि वे इस्लाम को भी सही तरह से नहीं जानते थे. यदि उन्होंने कभी कुरआन को पढ़ने का कष्ट किया होता, तो उन्हें पता चलता की इस्लाम चाहे कुछ भी हो पर शांति का धर्म तो कदापि नहीं है. दिल्ली के श्री विशन स्वरुप गोयल ने एक पुस्तिका लिखी थी- “काश! गाँधी ने कुरआन पढ़ी होती, तो….” इस पुस्तिका में उन्होंने लिखा है की यदि गाँधी ने कुरान को पढ़ा होता, तो इस्लाम के बारे में उनके विचार पूरी तरह भिन्न होते. इस पुस्तिका पर दिल्ली उच्च न्यायालय में केस भी चला था, पर न्यायाधीश ने पुस्तिका को आपत्तिजनक नहीं पाया.
इस पुस्तिका में कुरान की एक-दो नहीं बल्कि २४ ऐसी आयतों की सूची दी गयी है, जिनमें गैर-मुसलमानों के प्रति घृणा करने और उन पर सभी संभव अत्याचार करने का आदेश दिया गया है. उनमें कहा गया है कि काफिरों को दोस्त मत बनाओ, उन्हें दुश्मन मानो, उनको जहाँ भी पाओ मारो और सताओ, और तब तक सताते रहो जब तक वे तोबा करने यानी मुसलमान बनने को तैयार न हो जाएँ. सलमान रुश्दी ने इन्हीं आयतों के आधार पर अपना उपन्यास “सैटनिक वर्सेज” लिखा है, जिसको भारत की सेकुलर सरकार ने  बिना पढ़े ही प्रतिबंधित कर दिया है.
कई इस्लामी विद्वान कुरान में इन आयतों के होने से तो इनकार नहीं करते, लेकिन ये कहते हैं कि इनका सही अर्थ नहीं किया गया है और इनको मूल अरबी में समझा जाना चाहिए. परन्तु जिन लोगों ने कुरान को मूल अरबी में पढ़ा है, जैसे डा. अली सिना,  उनका कहना है कि मूल अरबी में इनका अर्थ कहीं अधिक भयानक है. अन्य भाषाओँ में अनुवाद करते समय तो इनका अर्थ थोड़ा उदार कर दिया जाता है.
इन आयतों में “काफ़िर” का सीधा अर्थ है- “गैर-मुसलमान.” कुरआन के अनुसार कुरआन और मुहम्मद पर ईमान न लाना ही “कुफ्र” है और ऐसा करने वाले “काफ़िर” हैं. इसलिए वास्तव में कुरआन सभी गैर-मुसलमानों को काफ़िर मानती है. खिलाफत आन्दोलन में गाँधी के अभिन्न सहयोगी मौलाना मुहम्मद अली ने एक बार नहीं बल्कि दो बार साफ-साफ कहा था कि उनके लिए पापी से पापी मुसलमान भी गाँधी से बेहतर है, क्योंकि वह मुसलमान है (और गाँधी काफ़िर है). क्या इसके बाद भी कुछ कहने को बाकी रह जाता है?
हमारा दुर्भाग्य है कि इसके बाद भी गाँधी की आँखें नहीं खुली और वे अपनी आखिरी साँस तक इस्लाम को शांति और भाईचारे का धर्म मानते रहे. गाँधी की इस मूर्खता की भयंकर कीमत हमारे प्यारे देश को चुकानी पड़ी,  जैसा कि हम आगे देखेंगे.
डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS)

भारत का एक दक्षिणपंथी, हिन्दू राष्ट्रवादी, अर्धसैनिक, स्वयंसेवक संगठन
यह लेख भारत के एक हिंदू संगठन आर एस एस के बारे में है। अन्य प्रयोग हेतु आर एस एस देखें।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का ध्वज
संक्षेपाक्षर आर० एस० एस०
स्थापना 27 सितम्बर 1925; 91 वर्ष पहले
विजयदशमी १९२५
संस्थापक डॉ॰ केशव बलिराम हेडगेवार
प्रकार दक्षिणपंथी स्वयंसेवक,[1] अर्धसैनिक[2][3][4][5][6]
वैधानिक स्थिति सक्रिय
उद्देश्य हिन्दू राष्ट्रवाद की वकालत करना[7]
मुख्यालय नागपुर, महाराष्ट्र, भारत
निर्देशांक 21°02′N 79°10′E / 21.04°N 79.16°Eनिर्देशांक: 21°02′N 79°10′E / 21.04°N 79.16°E
सेवाकृत क्षेत्र
भारत
विधि समूह चर्चा, बैठकों और अभ्यास के माध्यम से शारीरिक और मानसिक प्रशिक्षण
सदस्यता
५-६ दशलक्ष[8][9][10]
५६८५९ शाखाएँ (२०१६)[11]
आधिकारिक भाषा
हिन्दी
महासचिव
सुरेश 'भैयाजी' जोशी
सरसंघचालक
प.पू. मोहन जी भागवत
सम्बन्धन संघ परिवार
ध्येय "मातृभूमि के लिए नि:स्वार्थ सेवा"
जालस्थल rss.org
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, RSS के रूप में संक्षेपाक्षरित, भारत का एक दक्षिणपंथी,[1] हिन्दू राष्ट्रवादी,[5] अर्धसैनिक,[4] स्वयंसेवक संगठन हैं, जो भारत के सत्तारूढ़ दल भारतीय जनता पार्टी का व्यापक रूप से पैतृक संगठन माना जाता हैं।[12] यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अपेक्षा संघ या आर.एस.एस. के नाम से अधिक प्रसिद्ध है। बीबीसी के अनुसार संघ विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संस्थान है।[कृपया उद्धरण जोड़ें]

सबसे पहले ५० वर्ष बाद १९७५ में जब आपातकाल की घोषणा हुई तो तत्कालीन जनसंघ पर भी संघ के साथ प्रतिबंध लगा दिया गया। आपातकाल हटने के बाद जनसंघ का विलय जनता पार्टी में हुआ और केन्द्र में मोरारजी देसाई के प्रधानमन्त्रित्व में मिलीजुली सरकार बनी। १९७५ के बाद से धीरे-धीरे इस संगठन का राजनैतिक महत्व बढ़ता गया और इसकी परिणति भाजपा जैसे राजनैतिक दल के रूप में हुई जिसे आमतौर पर संघ की राजनैतिक शाखा के रूप में देखा जाता है। संघ की स्थापना के ७५ वर्ष बाद सन् २००० में प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एन०डी०ए० की मिलीजुली सरकार भारत की केन्द्रीय सत्ता पर आसीन हुई।

अनुक्रम

इतिहास

संस्थापना

इसकी शुरुआत सन् १९२५ में विजयादशमी के दिन डॉ॰ केशव हेडगेवार द्वारा की गयी थी।

भारत के राष्ट्रीय ध्वज का विरोध

शुरुआत में, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में तिरंगा को स्वीकार नहीं किया। संघ ने, अपने मुखपत्र "ऑर्गनाइज़र" के १७ जुलाई १९४७ दिनांक के "राष्ट्रीय ध्वज" शीर्षक वाले संपादकीय में, "भगवा ध्वज" को राष्ट्रीय ध्वज स्वीकार करने की मांग की।[13]

संरचना


संघ के संस्थापक डॉ॰ केशवराव बलिरामराव हेडगेवार
संघ में संगठनात्मक रूप से सबसे ऊपर सरसंघ चालक का स्थान होता है जो पूरे संघ का दिशा-निर्देशन करते हैं। सरसंघचालक की नियुक्ति मनोनयन द्वारा होती है। प्रत्येक सरसंघचालक अपने उत्तराधिकारी की घोषणा करता है। संघ के वर्तमान सरसंघचालक श्री मोहन भागवत हैं। संघ के ज्यादातर कार्यों का निष्पादन शाखा के माध्यम से ही होता है, जिसमें सार्वजनिक स्थानों पर सुबह या शाम के समय एक घंटे के लिये स्वयंसेवकों का परस्पर मिलन होता है। वर्तमान में पूरे भारत में संघ की लगभग पचास हजार से ज्यादा शाखा लगती हैं। वस्तुत: शाखा ही तो संघ की बुनियाद है जिसके ऊपर आज यह इतना विशाल संगठन खड़ा हुआ है। शाखा की सामान्य गतिविधियों में खेल, योग, वंदना और भारत एवं विश्व के सांस्कृतिक पहलुओं पर बौद्धिक चर्चा-परिचर्चा शामिल है।

संघ की रचनात्मक व्यवस्था इस प्रकार है:

केंद्र
क्षेत्र
प्रान्त
विभाग
जिला
तालुका
नगर
मण्डल
शाखा
सरसंघचालक

डॉक्टर केशवराव बलिराम हेडगेवार उपाख्य डॉक्टरजी (१९२५ - १९४०)
माधव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य गुरूजी (१९४० - १९७३)
मधुकर दत्तात्रय देवरस उपाख्य बालासाहेब देवरस (१९७३ - १९९३)
प्रोफ़ेसर राजेंद्र सिंह उपाख्य रज्जू भैया (१९९३ - २०००)
कृपाहल्ली सीतारमैया सुदर्शन उपाख्य सुदर्शनजी (२००० - २००९)
डॉ॰ मोहनराव मधुकरराव भागवत (२००९ -)

शाखा

शाखा किसी मैदान या खुली जगह पर एक घंटे की लगती है। शाखा में व्यायाम, खेल, सूर्य नमस्कार, समता (परेड), गीत और प्रार्थना होती है। सामान्यतः शाखा प्रतिदिन एक घंटे की ही लगती है। शाखाएँ निम्न प्रकार की होती हैं:

प्रभात शाखा: सुबह लगने वाली शाखा को "प्रभात शाखा" कहते है।
सायं शाखा: शाम को लगने वाली शाखा को "सायं शाखा" कहते है।
रात्रि शाखा: रात्रि को लगने वाली शाखा को "रात्रि शाखा" कहते है।
मिलन: सप्ताह में एक या दो बार लगने वाली शाखा को "मिलन" कहते है।
संघ-मण्डली: महीने में एक या दो बार लगने वाली शाखा को "संघ-मण्डली" कहते है।
पूरे भारत में अनुमानित रूप से ५०,००० शाखा लगती हैं। विश्व के अन्य देशों में भी शाखाओं का कार्य चलता है, पर यह कार्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नाम से नहीं चलता। कहीं पर "भारतीय स्वयंसेवक संघ" तो कहीं "हिन्दू स्वयंसेवक संघ" के माध्यम से चलता है।
शाखा में "कार्यवाह" का पद सबसे बड़ा होता है। उसके बाद शाखाओं का दैनिक कार्य सुचारू रूप से चलने के लिए "मुख्य शिक्षक" का पद होता है। शाखा में बौद्धिक व शारीरिक क्रियाओं के साथ स्वयंसेवकों का पूर्ण विकास किया जाता है।
जो भी सदस्य शाखा में स्वयं की इच्छा से आता है, वह "स्वयंसेवक" कहलाता हैं।

संघ परिवार भी देखें

अनेक संगठन हैं जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रेरित हैं और स्वयं को संघ परिवार के सदस्य बताते हैं।[14] अधिकांश मामलों में, इन संगठनों के शुरूआती वर्षों में इनके प्रारम्भ और प्रबन्धन हेतु प्रचारकों (संघ के पूर्णकालिक स्वयंसेवक) को नियुक्त किया जाता था।

संघ दुनिया के लगभग 80 से अधिक देशो में कार्यरत है। संघ के लगभग 50 से ज्यादा संगठन राष्ट्रीय ओर अंतराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त है ओर लगभग 200 से अधिक संघठन क्षेत्रीय प्रभाव रखते हैं। जिसमे कुछ प्रमुख संगठन है जो संघ की विचारधारा को आधार मानकर राष्ट्र और सामाज के बीच सक्रिय है। जिनमे कुछ राष्ट्रवादी, सामाजिक, राजनैतिक, युवा वर्गों के बीच में कार्य करने वाले, शिक्षा के क्षेत्र में, सेवा के क्षेत्र में, सुरक्षा के क्षेत्र में, धर्म और संस्कृति के क्षेत्र में, संतो के बीच में, विदेशो में, अन्य कई क्षेत्रों में संघ परिवार के संघठन सक्रिय रहते हैं।

सम्बद्ध संगठनों में कुछ प्रमुख संगठन ये हैं -[15]

भारतीय जनता पार्टी (भा० ज० पा०)[16]
भारतीय किसान संघ[16]
भारतीय मजदूर संघ[16]
सेवा भारती
राष्ट्र सेविका समिति[16]
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद[16]
शिक्षा भारती[16]
विश्व हिन्दू परिषद[16]
हिन्दू स्वयंसेवक संघ
स्वदेशी जागरण मंच, [17]
सरस्वती शिशु मन्दिर
विद्या भारती
वनवासी कल्याण आश्रम
मुस्लिम राष्ट्रीय मंच
बजरंग दल
अनुसूचित जाति-जमाती आरक्षण बचाओ परिषद
लघु उद्योग भारती[18][19]
भारतीय विचार केन्द्र
विश्व संवाद केन्द्र
राष्ट्रीय सिख संगत[20]
विवेकानन्द केन्द्र

संघ वर्ग


१९३९ के राष्ट्रीय अधिवेशन के समय का फोटो
ये वर्ग बौद्धिक और शारीरिक रूप से स्वयंसेवकों को संघ की जानकारी तो देते ही हैं साथ-साथ समाज, राष्ट्र और धर्म की शिक्षा भी देते हैं। ये निम्न प्रकार के होते हैं:

दीपावली वर्ग - ये वर्ग तीन दिनों का होता है। ये वर्ग तालुका या नगर स्तर पर आयोजित किया जाता है। ये हर साल दीपावली के आस पास आयोजित होता है।
शीत शिविर या (हेमंत शिविर) - ये वर्ग तीन दिनों का होता है, जो जिला या विभाग स्तर पर आयोजित किया जाता है। ये हर साल दिसंबर में आयोजित होता है।
निवासी वर्ग - ये वर्ग शाम से सुबह तक होता है। ये वर्ग हर महीने होता है। ये वर्ग शाखा, नगर या तालुका द्वारा आयोजित होता है।
संघ शिक्षा वर्ग - प्राथमिक वर्ग, प्रथम वर्ष, द्वितीय वर्ष और तृतीय वर्ष - कुल चार प्रकार के संघ शिक्षा वर्ग होते हैं। "प्राथमिक वर्ग" एक सप्ताह का होता है, "प्रथम" और "द्वितीय वर्ग" २०-२० दिन के होते हैं, जबकि "तृतीय वर्ग" 25 दिनों का होता है। "प्राथमिक वर्ग" का आयोजन सामान्यतः जिला करता है, "प्रथम संघ शिक्षा वर्ग" का आयोजन सामान्यत: प्रान्त करता है, "द्वितीय संघ शिक्षा वर्ग" का आयोजन सामान्यत: क्षेत्र करता है। परन्तु "तृतीय संघ शिक्षा वर्ग" हर साल नागपुर में ही होता है।
बौद्धिक वर्ग - ये वर्ग हर महीने, दो महीने या तीन महीने में एक बार होता है। ये वर्ग सामान्यत: नगर या तालुका आयोजित करता है।
शारीरिक वर्ग - ये वर्ग हर महीने, दो महीने या तीन महीने में एक बार होता है। ये वर्ग सामान्यत: नगर या तालुका आयोजित करता है।

सामाजिक सेवा और सुधार

हिन्दू धर्म में सामाजिक समानता के लिये संघ ने दलितों व पिछड़े वर्गों को मन्दिर में पुजारी पद के प्रशिक्षण का पक्ष लिया है। उनके अनुसार सामाजिक वर्गीकरण ही हिन्दू मूल्यों के हनन का कारण है।[21]

महात्मा गान्धी ने १९३४ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शिविर की यात्रा के दौरान वहाँ पूर्ण अनुशासन देखा और छुआछूत की अनुपस्थिति पायी। उन्होंने व्यक्तिगत रूप से पूछताछ की और जाना कि वहाँ लोग एक साथ रह रहे हैं तथा एक साथ भोजन कर रहे हैं।[22]

राहत और पुनर्वास


सुनामी के उपरान्त सहायता कार्य में जुटे स्वयंसेवक
राहत और पुर्नवास संघ कि पुरानी परंपरा रही है। संघ ने १९७१ के उड़ीसा चक्रवात और १९७७ के आंध्र प्रदेश चक्रवात में रहत कार्यों में महती भूमिका निभाई है।[23]

संघ से जुडी सेवा भारती ने जम्मू कश्मीर से आतंकवाद से परेशान ५७ अनाथ बच्चों को गोद लिया हे जिनमे ३८ मुस्लिम और १९ हिंदू है।

आलोचनाएँ और आरोप

महात्मा गाँधी की १९४८ में संघ के पूर्व सदस्य नाथूराम गोडसे ने उनकी हत्या कर दी थी जिसके बाद संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया। गोडसे संघ और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक भूतपूर्व स्वयंसेवक थे। बाद में एक जाँच समिति की रिपोर्ट आ जाने के बाद संघ को इस आरोप से बरी किया और प्रतिबंध समाप्त कर दिया गया।

संघ के आलोचकों द्वारा संघ को एक अतिवादी दक्षिणपंथी संगठन बताया जाता रहा है एवं हिंदूवादी और फ़ासीवादी संगठन के तौर पर संघ की आलोचना भी की जाती रही है। जबकि संघ के स्वयंसेवकों का यह कहना है कि सरकार एवं देश की अधिकांश पार्टियाँ अल्पसंख्यक तुष्टीकरण में लिप्त रहती हैं। विवादास्पद शाहबानो प्रकरण एवं हज-यात्रा में दी जानेवाली सब्सिडी इत्यादि की सरकारी नीति इसके प्रमाण हैं।

संघ का यह मानना है कि ऐतिहासिक रूप से हिंदू स्वदेश में हमेशा से ही उपेक्षित और उत्पीड़ित रहे हैं और वह सिर्फ़ हिंदुओं के जायज अधिकारों की ही बात करता है जबकि उसके विपरीत उसके आलोचकों का यह आरोप है कि ऐसे विचारों के प्रचार से भारत की धर्मनिरपेक्ष बुनियाद कमज़ोर होती है। संघ की इस बारे में मान्यता है कि हिन्दुत्व एक जीवन पद्धति का नाम है, किसी विशेष पूजा पद्धति को मानने वालों को हिन्दू कहते हों ऐसा नहीं है। हर वह व्यक्ति जो भारत को अपनी जन्म-भूमि मानता है, मातृ-भूमि व पितृ-भूमि मानता है (अर्थात्‌ जहाँ उसके पूर्वज रहते आये हैं) तथा उसे पुण्य भूमि भी मानता है (अर्थात्‌ जहां उसके देवी देवताओं का वास है); हिन्दू है। संघ की यह भी मान्यता है कि भारत यदि धर्मनिरपेक्ष है तो इसका कारण भी केवल यह है कि यहां हिन्दू बहुमत में हैं। इस क्रम में सबसे विवादास्पद और चर्चित मामला अयोध्या विवाद रहा है जिसमें बाबर द्वारा सोलहवीं सदी में निर्मित एक बाबरी मसजिद के स्थान पर राम मंदिर का निर्माण करना है।

उपलब्धियाँ

संघ की उपस्थिति भारतीय समाज के हर क्षेत्र में महसूस की जा सकती है जिसकी शुरुआत सन १९२५ से होती है। उदाहरण के तौर पर सन १९६२ के भारत-चीन युद्ध में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू संघ की भूमिका से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने संघ को सन १९६३ के गणतंत्र दिवस की परेड में सम्मिलित होने का निमन्त्रण दिया। सिर्फ़ दो दिनों की पूर्व सूचना पर तीन हजार से भी ज्यादा स्वयंसेवक पूर्ण गणवेश में वहाँ उपस्थित हो गये।

संघ की प्रार्थना


प्रार्थना की मुद्रा में स्वयंसेवक
मुख्य लेख : नमस्ते सदा वत्सले
संघ की प्रार्थना संस्कृत में है। प्रार्थना की आखरी पंक्ति हिंदी में है।
लड़कियों/स्त्रियों की शाखा राष्ट्र सेविका समिति और विदेशों में लगने वाली हिन्दू स्वयंसेवक संघ की प्रार्थना अलग है। संघ की शाखा या अन्य कार्यक्रमों में इस प्रार्थना को अनिवार्यत: गाया जाता है और ध्वज के सम्मुख नमन किया जाता है।


नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे
त्वया हिन्दुभूमे सुखं वर्धितोहम्।
महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे
पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते॥ १॥

प्रभो शक्तिमन् हिन्दुराष्ट्राङ्गभूता
इमे सादरं त्वां नमामो वयम्
त्वदीयाय कार्याय बध्दा कटीयम्
शुभामाशिषं देहि तत्पूर्तये।
अजय्यां च विश्वस्य देहीश शक्तिं
सुशीलं जगद्येन नम्रं भवेत्
श्रुतं चैव यत्कण्टकाकीर्ण मार्गं
स्वयं स्वीकृतं नः सुगं कारयेत्॥ २॥

समुत्कर्षनिःश्रेयस्यैकमुग्रं
परं साधनं नाम वीरव्रतम्
तदन्तः स्फुरत्वक्षया ध्येयनिष्ठा
हृदन्तः प्रजागर्तु तीव्रानिशम्।
विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिर्
विधायास्य धर्मस्य संरक्षणम्।
परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं
समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम्॥ ३॥

॥ भारत माता की जय ॥

प्रार्थना का हिन्दी में अर्थ

हे वात्सल्यमयी मातृभूमि, तुम्हें सदा प्रणाम! इस मातृभूमि ने हमें अपने बच्चों की तरह स्नेह और ममता दी है। इस हिन्दू भूमि पर सुखपूर्वक मैं बड़ा हुआ हूँ। यह भूमि महा मंगलमय और पुण्यभूमि है। इस भूमि की रक्षा के लिए मैं यह नश्वर शरीर मातृभूमि को अर्पण करते हुए इस भूमि को बार-बार प्रणाम करता हूँ।

हे सर्व शक्तिमान परमेश्वर, इस हिन्दू राष्ट्र के घटक के रूप में मैं तुमको सादर प्रणाम करता हूँ। आपके ही कार्य के लिए हम कटिबद्ध हुवे है। हमें इस कार्य को पूरा करने किये आशीर्वाद दे। हमें ऐसी अजेय शक्ति दीजिये कि सारे विश्व मे हमे कोई न जीत सकें और ऐसी नम्रता दें कि पूरा विश्व हमारी विनयशीलता के सामने नतमस्तक हो। यह रास्ता काटों से भरा है, इस कार्य को हमने स्वयँ स्वीकार किया है और इसे सुगम कर काँटों रहित करेंगे।

ऐसा उच्च आध्यात्मिक सुख और ऐसी महान ऐहिक समृद्धि को प्राप्त करने का एकमात्र श्रेष्ट साधन उग्र वीरव्रत की भावना हमारे अन्दर सदेव जलती रहे। तीव्र और अखंड ध्येय निष्ठा की भावना हमारे अंतःकरण में जलती रहे। आपकी असीम कृपा से हमारी यह विजयशालिनी संघठित कार्यशक्ति हमारे धर्म का सरंक्षण कर इस राष्ट्र को परम वैभव पर ले जाने में समर्थ हो।

॥ भारत माता की जय॥

हिन्दी काव्यानुवाद

हे परम वत्सला मातृभूमि! तुझको प्रणाम शत कोटि बार।
हे महा मंगला पुण्यभूमि ! तुझ पर न्योछावर तन हजार॥

हे हिन्दुभूमि भारत! तूने, सब सुख दे मुझको बड़ा किया;
तेरा ऋण इतना है कि चुका, सकता न जन्म ले एक बार।
हे सर्व शक्तिमय परमेश्वर! हम हिंदुराष्ट्र के सभी घटक,
तुझको सादर श्रद्धा समेत, कर रहे कोटिशः नमस्कार॥

तेरा ही है यह कार्य हम सभी, जिस निमित्त कटिबद्ध हुए;
वह पूर्ण हो सके ऐसा दे, हम सबको शुभ आशीर्वाद।
सम्पूर्ण

संघ साहित्य के प्रकाशक

निम्नलिखित प्रकाशन संघ की योजना द्वारा संचालित नहीं है, निजी हैं। इन प्रकाशनों ने भी उच्च कोटि का संघ साहित्य बड़ी संख्या में प्रकाशित किया है।

१. सुरुचि प्रकाशन , देशबन्धु गुप्ता मार्ग , झण्डेवाला, नई दिल्ली-५५

२. लोकहित प्रकाशन , संस्कृति भवन ; राजेन्द्र नगर, लखनऊ-४

३. राष्ट्रोत्थान साहित्य , केशव शिल्प ; केम्पगौड़ा नगर, बंगलौर-१९

४. भारतीय विचार साधना

(क) डॉ॰ हेडगेवार भवन महाल, नागपुर-४४०००२
(ख) मोती बाग ; ३०९, शनिवार पेठ, पुणे-४११०३०
(ग) मंगलदास बाड़ी, डॉ॰ भडकम्कर मार्ग नाज सिनेमा परिसर, मुम्बई-४०००४
५. ज्ञान गंगा प्रकाशन , भारती भवन, बी-१५, न्यू कालोनी, जयपुर-३०२००१

६. अर्चना प्रकाशन , एच.आई.जी.-१८, शिवाजी नगर, भोपाल-४६२०१६

७. साधना पुस्तक प्रकाशन , राम निवास ; बलिया काका मार्ग, जूनाढोर बाजार के सामने, कांकरिया, अमदाबाद -३८००२८

८. सातवलेकर स्वाध्याय , पो - किलापारडी , मण्डल जिला-वलसाड, गुजरात-३९६१२५

९. साहित्य निकेतन , ३-४/८५२, बरकतपुरा, हैदराबाद-५०००२७

१०. स्वस्तिश्री प्रकाशन , ४४/९, नवसहयाद्री सोसाइटी , नवसहयाद्री पोस्टास मोर पुणे-४११०५२

११. जागृति प्रकाशन , एफ. १०९, सेक्टर-२७ , नोएडा (गौतम बुद्ध नगर) उ.प्र. २०१३०१

१२. सूर्य भारती प्रकाशन , २५९६, नई सड़क, दिल्ली-११०००६

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS)

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) एक हिंदू राष्ट्रवादी संघटन है जिसके सिद्धांत हिंदुत्व मे निहित और आधारित हैं। यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अपेक्षा संघ या आर एस एस नाम से अधिक प्रसिद्ध है। इसकी शुरुआत 1925 में डा. केशव हेडगेवार द्वारा की गयी थी । बीबीसी के अनुसार, संघ विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संस्थान है. 1925 के बाद से धीरे-धीरे इस संस्थान का राजनैतिक महत्व बढता गया और इसकी परिणति भाजपा जैसे राजनैतिक दल के रूप में हुई जिसे आमतौर पर संघ की राजनैतिक शाखा के रूप में देखा जाता है जो भारत के केन्द्रीय सत्ता पर अन्तत: सन 2000 में आसीन हुई।

 संघ में संगठनात्मक रूप से सबसे ऊपर सरसंघ चालक का स्थान होता है जो पूरे संघ का दिशा-निर्देशन करते हैं। सरसंघचालक की नियुक्ति मनोनयन द्वारा होती है। हर सरसंघचालक अपने उत्तराधिकारी की घोषणा करता है। संघ के वर्तमान सरसंघचालक श्री मोहन भागवत हैं। संघ के ज्यादातर कार्यों का निष्पादन शाखाओं द्वारा होता है, जिसमें सार्वजनिक स्थानों पर सुबह या शाम के समय एक से दो घंटे के लिये स्वयंसेवकों का परस्पर मिलन होता है। वर्तमान में पूरे भारत में संघ की लगभग पचास हजार से ज्यादा शाखाएँ लगती हैं। ये शाखाएँ संघ की बुनियाद होती है। सामान्यतया शाखा की गतिविधियों में खेल, योग वंदना और भारत एवं विश्व की साँस्कृतिक पहलुओं पर बौद्धिक चर्चा-परिचर्चा शामिल है।
 शाखा किसी मैदान या खुली जगह पर आधा / एक / दो घंटे की लगती है . शाखा में खेल, सूर्य नमस्कार, समता (परेड), गीत और प्रार्थना होती है. साधारनतया शाखा एक घंटे की व रोज लगती है.

 सुबह लगने वाली शाखा को प्रभात शाखा कहते है.

 शाम को लगने वाली शाखा को सायं शाखा कहते है.

 रात्रि को लगने वाली शाखा को रात्रि शाखा कहते है.

 सप्ताह में एक या दो बार लगने वाली शाखा को मिलन कहते है.

 महीने में एक या दो बार लगने वाली शाखा को संघ मण्डली कहते है.

 पुरे भारत में अनुमानित रूप से ५०,००० शाखाएं लगती है. विश्व के अन्य देशों में भी शाखाओं का कार्य चलता है, पर यह कार्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नाम से नहीं चलता है. कही पर भारतीय स्वयंसेवक संघ तो कही हिन्दू स्वयंसेवक संघ के माध्यम से चलता है.
 शाखा में कार्यवाह का पद सबसे बड़ा होता है. उसके बाद शाखाओं का दैनिंक कार्य सुचारू रूप से चलने के लिए मुख्य शिक्षक का पद होता है. शाखा में बोद्धिक व शारीरिक क्रियाओं के साथ स्वयमसेवकों का पूर्ण विकास किया जाता है.
 हर सदस्य जो शाखा में आता है, वह स्वयंसेवक कहलाता है.

 महात्मा गाँधी की मुस्लिम तुष्टीकरण नीति से क्षुब्ध होकर 1948 में नाथूराम गोडसे द्वारा उनकी हत्या करने के बाद संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। गोडसे संघ और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक भूतपूर्व स्वयंसेवक थे। बाद में एक जाँच समिति की जाँच के बाद संघ को इस आरोप से बरी कर दिया गया और प्रतिबंध समाप्त कर दिया गया।

 संघ के आलोचकों के द्वारा संघ को एक अतिवादी दक्षिणपंथी संगठन बताया जाता रहा है एवं हिंदूवादी और फ़ासीवादी संगठन के तौर पर संघ की आलोचना की जाती रही है। जबकि संघ के स्वयंसेवकों का कहना है कि सरकार एवं देश की अधिकांश पार्टियाँ अल्पसंख्यक- तुष्टीकरण में लिप्त रहती हैं। उदाहरणार्थ- विवादास्पद शाहबानो प्रकरण एवं हज यात्रा में दी जानेवाली सब्सिडी इत्यादि की नीति समाप्त करे।

 संघ का यह मानना है कि ऐतिहासिक रूप से हिंदू स्वदेश में ही हमेशा से उपेक्षित और उत्पीड़ित रहे हैं और हम सिर्फ़ हिंदुओं के जायज अधिकारों की बात करते हैं। आलोचकों का कहना है कि ऐसे विचारों एवं प्रचारों से भारत का धर्मनिरपेक्ष बुनियाद कमज़ोर होता है। इस क्रम में सबसे विवादास्पद और चर्चित मामला अयोध्या विवाद रहा है जिसमें बाबर द्वारा सोलहवीं सदी में निर्मित एक ढाँचा विवादित ढाँचा के स्थान पर राम मंदिर का निर्माण करना है। अधिकांश हिंदुओं का ऐसा मानना है कि यहीं भगवान राम की पैदाईश हुई थी।

 संघ की उपस्थिति भारतीय समाज के हर क्षेत्र में महसूस की जा सकती है जिसकी शुरुआत 1925 से होती है। उदाहरण के तौर पर 1962 के भारत-चीन युद्ध में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू संघ की भूमिका से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने संघ को गणतंत्र दिवस के 1963 के परेड में सम्मिलित होने का निमन्त्रण दिया। सिर्फ़ दो दिनों की पूर्व सूचना पर तीन हजार से भी ज्यादा स्वयंसेवक पूर्ण गणवेश में वहाँ उपस्थित हो गये।

 वर्तमान समय में संघ के दर्शन का पालन करने वाले कतिपय लोग देश के सर्वोच्च पदों तक पहुँचने मे भीं सफल रहे हैं। ऐसे प्रमुख व्यक्तियों में उपराष्ट्रपति पद पर भैरोसिंह शेखावत, प्रधानमंत्री पद पर अटल बिहारी वाजपेयी एवं उपप्रधानमंत्री व गृहमंत्री के पद पर लालकृष्ण आडवाणी जैसे लोग शामिल हैं।

 संघ के सरसं

कृपाहल्ली सीतारमैया सुदर्शन उपाख्य सुदर्शनजी

श्री कुप्पाहाली सीतारमय्या सुदर्शन (१८ जून १९३१-१५ सितंबर २०१२) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पाँचवें सरसंघचालक थे। मार्च २००९ में श्री मोहन भागवत को छठवाँ सरसंघचालक नियुक्त कर स्वेच्छा से पदमुक्त हो गये। 15 सितम्बर 2012 को अपने जन्मस्थान रायपुर में 81 वर्ष की अवस्था में इनका निधन हो गया।[1]

जीवनी संपादित करें

श्री के एस सुदर्शन का जन्म रायपुर (छत्तीसगढ़) में एक कन्नड़ भाषी परिवार में हुआ था। उन्होने जबलपुर के राजकीय इंजीनियरी महाविद्यालय (सागर विश्वविद्यालय) से दूरसंचार प्रौद्योगिकी में स्नातक की उपाधि अर्जित की। १६ जनवरी २००९ को मेरठ के शोभित विश्वविद्यालय ने उनको 'डॉक्टर ऑफ आर्ट्स' की मानद उपाधि से विभूषित किया।